हिन्दू लड़की की मुस्लिम लड़के से शादी देश का तानाबाना कैसे खराब कर रही? सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पूछा यह सवाल

Date:


सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक अहम टिप्पणी करते हुए सवाल किया कि किसी हिंदू लड़की का मुस्लिम लड़के से विवाह करना देश के ताने-बाने को कैसे नुकसान पहुंचा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म ‘यादव जी की लव स्टोरी’ पर प्रतिबंध लगाने की मांग वाली याचिका को खारिज करते हुए यह बड़ी टिप्पणी की.

यह याचिका विश्व यादव परिषद के प्रमुख की ओर से दाखिल की गई थी. याचिका में दावा किया गया था कि फिल्म का शीर्षक यादव समुदाय के खिलाफ एक सीधा और आपत्तिजनक स्टीरियोटाइप बनाता है. इसके साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि फिल्म में यादव समुदाय की एक हिंदू लड़की और एक मुस्लिम युवक के बीच प्रेम संबंध दिखाया गया है, जिससे सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंच सकता है.

सुप्रीम कोर्ट का सवाल

इस मामले की सुनवाई जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने की. सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ता की दलीलों पर कड़ी आपत्ति जताई और साफ शब्दों में सवाल किया, ‘क्या हिंदू लड़की का मुस्लिम लड़के से विवाह करना राष्ट्रीय ताने-बाने को नष्ट करता है?’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसने रिकॉर्ड पर मौजूद सभी दस्तावेजों और सामग्री का अवलोकन किया है. पीठ के मुताबिक, याचिका का मुख्य आधार यह था कि फिल्म का नाम समाज में यादव समुदाय को गलत रोशनी में दिखाता है और इसलिए फिल्म का शीर्षक बदला जाना चाहिए. हालांकि, अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया.

पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘हम यह समझने में असफल हैं कि किसी फिल्म का शीर्षक मात्र किसी समुदाय को कैसे बदनाम कर सकता है. फिल्म के नाम में ऐसा कोई शब्द या विशेषण नहीं है, जो यादव समुदाय को नकारात्मक रूप में दर्शाता हो. इस संबंध में जताई गई आशंकाएं पूरी तरह निराधार हैं.’

‘घूसखोर पंडित’ से अलग है मामला

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की तुलना हाल ही में आए फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ से जुड़े आदेश से भी की और दोनों को अलग बताया. अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘घूसखोर’ शब्द अपने आप में भ्रष्टाचार जैसा नकारात्मक अर्थ रखता है, जिससे किसी समुदाय को गलत तरीके से चित्रित किया जा सकता है. लेकिन ‘यादव जी की लव स्टोरी’ के मामले में ऐसी कोई नकारात्मकता नहीं जुड़ी हुई है.

पीठ ने कहा कि इस फिल्म के शीर्षक या कथानक पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत लगाए जाने वाले किसी भी ‘उचित प्रतिबंध’ का सवाल ही नहीं उठता. अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि फिल्म का नाम यादव समुदाय को न तो बदनाम करता है और न ही किसी नकारात्मक तरीके से पेश करता है. इसलिए याचिका को खारिज किया जाता है.

याचिकाकर्ता के वकील ने यह भी दलील दी कि फिल्म खुद को एक वास्तविक घटना पर आधारित बताती है. इस पर पीठ ने ‘बैंडिट क्वीन’ फिल्म का उदाहरण देते हुए कहा कि उस मामले में भी गुर्जर समुदाय को खराब तरीके से दिखाए जाने का आरोप लगा था, लेकिन अदालत ने उस याचिका को स्वीकार नहीं किया था.

‘मोटी चमड़ी रखें’

वकील ने यह आग्रह भी किया कि चूंकि फिल्म अभी रिलीज नहीं हुई है, इसलिए यदि रिलीज के बाद किसी की भावनाएं आहत होती हैं तो याचिकाकर्ता को दोबारा अदालत का दरवाजा खटखटाने की अनुमति दी जाए. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने व्यावहारिक और हल्के अंदाज में टिप्पणी करते हुए कहा, ‘मोटी चमड़ी रखें. यह एक काल्पनिक कहानी है. एक हफ्ते में सब खत्म हो जाएगा. आजकल वैसे भी कोई थिएटर नहीं जाता, सब कुछ मोबाइल पर ही देखा जा रहा है.’

इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया और साफ कर दिया कि केवल आशंकाओं के आधार पर किसी फिल्म पर रोक नहीं लगाई जा सकती. अदालत ने यह भी संकेत दिया कि सामाजिक विविधता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संदेह की नजर से देखना संविधान की भावना के खिलाफ है.



Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related