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प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इजरायल के ‘हाइफा’ शहर को आजाद कराने में भारतीय सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान को इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने बेहद भावुक अंदाज में याद किया है. नेतन्याहू ने कहा कि हम भारतीय कमांडरों की उस शहादत को कभी नहीं भूल सकते. इसके साथ ही उन्होंने गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर और यहूदी आंदोलन के बीच के गहरे वैचारिक कनेक्शन का भी विशेष रूप से जिक्र किया.
नेतन्याहू ने पीएम मोदी को महान नेता बताया और भारत की तारीफ की.
इजरायल और भारत की दोस्ती सिर्फ आधुनिक रक्षा सौदों, व्यापार और कूटनीति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें इतिहास के उस दौर से जुड़ी हैं जब दोनों ही देश अपने वजूद और आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक बार फिर दोनों देशों के इस ऐतिहासिक और जज्बाती रिश्ते को याद करते हुए भारतीय शूरवीरों को नमन किया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल संसद में भाषण देने से पहले स्वागत करते हुए नेतन्याहू ने प्रथम विश्व युद्ध को याद किया. जब इजरायल के हाइफा शहर को आजाद कराने में भारतीय सैनिकों और कमांडरों के सर्वोच्च बलिदान दिया था. नेतन्याहू ने इसे भावुक अंदाज में याद किया. साथ ही उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर के साथ यहूदियों के गहरे वैचारिक संबंध को भी दुनिया के सामने रखा.
अपने संबोधन में नेतन्याहू ने इतिहास के उस पन्ने को पलटा जब इजरायल (तत्कालीन फिलिस्तीन क्षेत्र) पर क्रूर ओटोमन साम्राज्य का कब्जा था. नेतन्याहू ने कहा, मैं जानता हूं कि आप यह बात जानते हैं, लेकिन मैं यह सुनिश्चित करना चाहता हूं कि हर कोई इस सच्चाई को जाने. प्रथम विश्व युद्ध में, जब हम अभी भी ओटोमन कब्जे में थे, तब ब्रिटिश सेना ने इस देश को आजाद कराने में हमारी मदद की थी. उस सेना में ‘जाबोटिंस्की’ सहित कई यहूदी लड़ाके और पहली यहूदी बटालियन शामिल थी. लेकिन उनके साथ वो बहादुर सैनिक और भारतीय कमांडर भी थे, जिन्होंने हाइफा को आजाद कराने की लड़ाई में शेरों की तरह जंग लड़ी.
‘हम वो बलिदान कभी नहीं भूलते’
नेतन्याहू ने भारतीय सैनिकों के उस अदम्य साहस को याद किया जब युद्ध के मैदान में एक वक्त ऐसा आया था कि सेनाएं पीछे धकेली जा रही थीं. उस मुश्किल घड़ी में पीछे हटने के बजाय, भारतीय कमांडरों और सैनिकों ने दुश्मन के मोर्चे पर सीधा धावा बोल दिया. प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने भारी मन से कृतज्ञता जताते हुए कहा, उन भारतीय कमांडरों ने आगे बढ़कर हमला किया और हमारे लिए अपनी जान दे दी… उन्होंने हमारे लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया. हम इस बात को भी कभी नहीं भूलते. इतिहास के झरोखे से देखें तो, 23 सितंबर 1918 को भारतीय घुड़सवार सेना विशेष रूप से जोधपुर और मैसूर लांसर्स ने मशीनगनों से लैस ओटोमन सेना पर केवल तलवारों और भालों के दम पर हमला कर हाइफा शहर को आजाद कराया था. इसी याद में आज भी भारत और इजरायल हर साल हाइफा दिवस मनाते हैं.
रबींद्रनाथ टैगोर और इजरायल का क्या कनेक्शन
नेतन्याहू का यह बयान सिर्फ युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने दोनों देशों के बीच के बौद्धिक और सांस्कृतिक संबंधों की गहराई को भी छुआ. उन्होंने भारत के महान कवि और विचारक रबींद्रनाथ टैगोर का विशेष रूप से उल्लेख किया. नेतन्याहू ने कहा, टैगोर… गुरुदेव टैगोर ने हमारे राष्ट्रीय आंदोलन (यहूदी राष्ट्रवाद या जियोनिज्म) के बारे में बहुत ही सकारात्मक बातें कही थीं. उनके विचार हमारे लिए इतने अहम थे कि उनकी रचनाओं का हिब्रू भाषा में अनुवाद भी किया गया था. यह इस बात का प्रमाण है कि इजरायल के निर्माण से पहले ही, भारत के महान विचारकों और इजरायल के संस्थापकों के बीच एक गहरा वैचारिक और कूटनीतिक तालमेल मौजूद था.
आज इस बयान के मायने
नेतन्याहू का भारतीय सैनिकों और टैगोर को याद करना कोई सामान्य कूटनीतिक बयान नहीं है. यह ऐसे वक्त में आया है जब पश्चिम एशिया भारी तनाव से गुजर रहा है और इजरायल कई मोर्चों पर लड़ रहा है. ऐसे मुश्किल समय में अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगियों को याद करना, भारत और इजरायल के बीच अटूट विश्वास को दर्शाता है. यह बयान साफ करता है कि इजरायलियों के दिल में भारतीयों के लिए जो सम्मान है, वह सिर्फ आज के राजनीतिक संबंधों की वजह से नहीं है, बल्कि उस खून से सींचा गया है जो सौ साल पहले हाइफा की मिट्टी में बहा था.


