आत्मनिर्भर बनीं बालाघाट की बेटियां, पहले घर का काम फिर व्यापार, गजब है जैविक कांसेप्ट

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Balaghat women success story : बालाघाट की मगरदर्रा की रहने वाली 14 महिलाओं ने आत्मा प्रोजेक्ट की मदद से समूह शुरू किया. समूह का नाम रखा आस्था स्वयं सहायता समूह नाम रखा गया. इस समूह में जुड़ने वाली हर महिला अपने घर के काम निपटा कर जैविक खाद बनाने का काम करती है. सबसे पहले महिलाएं सुबह के वक्त गौ मूत्र इकट्ठा करती है.

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Balaghat News : भारतीय महिलाओं के लिए एक धारणा सदियों से बनी है कि वह सिर्फ घरेलू कार्यों के लिए ही बनी है. लेकिन इस धारणा  को गलत साबित किया है बालाघाट से करीब 22 किलोमीटर दूर स्थित मगरदर्रा नाम गांव की महिलाओं ने. दरअसल, एक गांव की महिलाओं स्व सहायता समूह शुरू किया और अब वह आत्मनिर्भर बनने की राह पर है. अब समूह ने बायो रिसोर्स सेंटर स्थापित किया है. इससे समूह को उम्मीद है कि आने वाले समय में उनका व्यवसाय तेज हो जाएगा. जानिए समूह की पूरी कहानी…

एक साल पहले शुरू किया समूह
बीते साल मगरदर्रा की रहने वाली 14 महिलाओं ने आत्मा प्रोजेक्ट की मदद से समूह शुरू किया. समूह का नाम रखा आस्था स्वयं सहायता समूह नाम रखा गया. इस समूह में जुड़ने वाली हर महिला अपने घर के काम निपटा कर जैविक खाद बनाने का काम करती है. सबसे पहले महिलाएं सुबह के वक्त गौ मूत्र इकट्ठा करती है. साथ ही जैविक खाद बनाने वाली सामग्री जमा करती है और दोपहर के वक्त या फिर शाम के वक्त जैविक खाद बनाती है. इसमें वह जीवामृत, अग्निअस्त्र, घन जीवामृत सहित कई तरह के खाद बनाती है.

पहले गांव में बेचती थी अब बढ़ेगा दायरा
समूह की प्रमुख सीमा एड़े का कहना है कि वह पहले छोटे स्तर पर काम करती थी. ऐसे में जैविक खाद का उत्पादन कम होता था. ऐसे में अपने और आसपास के गांव के किसानों को जैविक खाद सप्लाई करती थी. इससे समूह को लगभग हर महीने 25 हजार रुपए तक आय होती थी. लेकिन अब बायो रिसोर्स सेंटर बनाने के बाद समूह ज्यादा उत्पादन कर सकेगा और उनके व्यवसाय का दायरा बढ़ेगा. इस प्लांट को लगाने के लिए शासन से उन्हें 1 लाख रुपए की राशि मिली और अब उन्हें उम्मीद है उनके सपनों को पंख लग जाएंगे. इस समूह में सीमा एड़े और सुलेखा कटरे दोनों मिलकर दूसरे गांवों के किसानों को जैविक खेती की ट्रेनिंग भी देने के लिए जाती है.

अब होगा बड़े पैमाने पर उत्पादन
समूह ने अब बायो रिसोर्स सेंटर लगाया है. ऐसे में उनका उत्पादन पहले से कई गुना बढ़ जाएगा. ऐसे में उनके प्रोडक्ट वह न सिर्फ अपने और आसपास के गांव में बेच सकेंगी बल्कि दूर-दूर तक जैविक खाद सप्लाई कर सकेगी. उन्होंने बताया कि वह अपना प्रोडक्ट एक थोक व्यापारी को बेचेगी उसके बाद थोक व्यापारी रिटेलर को फिर किसान को मिलेगा. ऐसे में ज्यादा उत्पादन से लाभ भी ज्यादा ही होगा.

अब बदल रही है जिंदगी
महिलाओं ने बताया कि पहले जिदंगी आसान न थी. छोटे-छोटे कामों के लिए उन्हें साहूकारों से कर्ज लेना पड़ता था. लेकिन अब वह आत्मनिर्भर हो रही है. अब वह घर और खेती के काम के साथ अपनी अतिरिक्त आय भी अर्जित कर रही है. जिससे न सिर्फ वह अपने बल्कि परिवार के भी सपने पूरे कर रही है.



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