यदि आपने 1990 का वो दौर देखा है, जब टीवी के ऊपर एंटीना लगा होता था और घर में नया रंगीन टीवी आना पूरे मोहल्ले के लिए एक बड़ा जश्न होता था. उस जमाने में अगर किसी के घर में वीडियोकॉन का टीवी या वॉशिंग मशीन दिख जाती थी, तो मान लिया जाता था कि ये परिवार तरक्की कर रहा है. लोगों के दिलों में इस नाम का इतना गहरा असर था कि वीडियोकॉन सिर्फ एक ब्रांड नहीं, बल्कि हर हिंदुस्तानी का गौरव बन गया था. औरंगाबाद के एक छोटे-से कस्बे से निकलकर पूरी दुनिया में अपना डंका बजाने वाली इस कंपनी की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है. ये कहानी एक ऐसी सफलता की है, जिसने आसमान को छुआ और फिर एक ऐसी गिरावट की, जिसने सबको हैरान कर दिया.
महाराष्ट्र के औरंगाबाद में वेणुगोपाल धूत नाम के एक नौजवान बड़े सपने देख रहा था. धूत परिवार का कारोबार वैसे तो खेती-बाड़ी और छोटे-मोटे व्यापार से जुड़ा था, लेकिन वेणुगोपाल कुछ अलग करना चाहते थे. 1980 के दशक की शुरुआत में जब भारत में ब्लैक एंड व्हाइट टीवी का जमाना था, तब उन्होंने महसूस किया कि आने वाला समय रंगीन होने वाला है. उन्होंने साल 1979 में वीडियोकॉन की नींव रखी. उस वक्त भारत में विदेशी कंपनियों का बोलबाला था, लेकिन धूत को भरोसा था कि अगर वो भारतीय लोगों की जरूरत और जेब के हिसाब से सामान बनाएंगे, तो उन्हें कोई नहीं रोक पाएगा.
कलर टीवी ने मचा दिया था तहलका!
शुरू के दिन बहुत संघर्ष भरे थे. औरंगाबाद में एक छोटी-सी फैक्ट्री डाली गई. न तो बहुत बड़ा बजट था और न ही बहुत बड़ी मशीनें. लेकिन धूत के पास एक विजन था. उन्होंने जापान की कंपनी तोशिबा के साथ हाथ मिलाया, ताकि तकनीक के मामले में वो किसी से पीछे न रहें. जब वीडियोकॉन ने अपना पहला कलर टीवी बाजार में उतारा, तो उसने तहलका मचा दिया. उस वक्त लोगों के लिए टीवी एक लग्जरी थी, लेकिन वीडियोकॉन ने उसे एक जरूरत बना दिया. कम कीमत और टिकाऊ सामान ने मिडिल क्लास परिवारों के दिल में जगह बना ली. देखते ही देखते औरंगाबाद की वो छोटी-सी यूनिट भारत की सबसे बड़ी कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी में बदल गई.
वीडियोकॉन की कामयाबी का सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब उन्होंने सिर्फ टीवी तक सीमित न रहकर फ्रिज, वॉशिंग मशीन और एयर कंडीशनर के बाजार में कदम रखा. 90 के दशक में घर-घर में वीडियोकॉन की वॉशिंग मशीनें गूंजने लगीं. कंपनी का विज्ञापन ‘ब्रिंग होम द मैजिक’ लोगों को याद हो गया. वेणुगोपाल धूत एक ऐसे बिजनेसमैन बनकर उभरे, जो जानते थे कि भारत की नब्ज क्या है. उन्होंने छोटे शहरों और गांवों तक अपना नेटवर्क फैलाया. उस दौर में वीडियोकॉन का मतलब ही भरोसा होता था. कंपनी इतनी बड़ी हो गई कि उसने दुनियाभर में अपनी धाक जमाने के लिए विदेशी कंपनियों को खरीदना शुरू कर दिया. उन्होंने दक्षिण कोरिया की कंपनी ‘डेवू’ के इलेक्ट्रॉनिक्स बिजनेस को खरीदने की कोशिश की और कई अंतरराष्ट्रीय मार्केट में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई.
जरूरत से ज्यादा पसार लिए पैर
लेकिन असली कहानी तब शुरू हुई, जब वीडियोकॉन की सफलता ने उसे थोड़ा ज्यादा ही निडर बना दिया. साल 2000 के बाद जब बाजार बदल रहा था, तब वीडियोकॉन ने एक ऐसी गलती की, जिसे बिजनेस की दुनिया में ‘ओवर-डायवर्सिफिकेशन’ कहा जाता है. यानी एक साथ कई नावों पर सवार होना. वेणुगोपाल धूत को लगा कि अगर वो टीवी और फ्रिज में कामयाब हैं, तो वो हर जगह कामयाब हो सकते हैं. उन्होंने अपना ध्यान इलेक्ट्रॉनिक्स से हटाकर तेल, गैस, बिजली और सबसे रिस्की ‘टेलीकॉम’ सेक्टर की तरफ मोड़ दिया. कंपनी ने भारी कर्ज लेकर स्पेक्ट्रम खरीदे और मोबाइल सेवा शुरू की. बहुत से लोगों ने वीडियोकॉन की सिम इस्तेमाल की होगी.
सैमसंग-LG ने बना ली बाजार पर पकड़
यही वो वक्त था जब कंपनी की जड़ें हिलने लगीं. टेलीकॉम के बिजनेस में पैसा पानी की तरह बह रहा था, लेकिन मुनाफा नहीं हो रहा था. दूसरी तरफ, इलेक्ट्रॉनिक बाजार में सैमसंग और एलजी जैसी दक्षिण कोरियाई कंपनियों ने एंट्री मारी. इन कंपनियों के पास नई तकनीक थी, स्लिम डिजाइन वाले टीवी थे और मार्केटिंग नेक्सट लेवल की थी. वीडियोकॉन के पुराने पड़ चुके मॉडल और तकनीक इन विदेशी कंपनियों के सामने टिक नहीं पाए. कंपनी का जो ध्यान अपने कोर बिजनेस यानी इलेक्ट्रॉनिक्स पर होना चाहिए था, वो कर्ज चुकाने और दूसरे घाटे वाले बिजनेस को संभालने में लगा रहा.
2जी स्कैम में खो बैठे टेलीकॉम लाइसेंस
साल 2012 में एक और बड़ा झटका लगा. 2G स्कैम की जांच के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने वीडियोकॉन के कई टेलीकॉम लाइसेंस रद्द कर दिए. कंपनी ने इस बिजनेस में हजारों करोड़ रुपये लगाए थे, जो एक झटके में डूब गए. अब स्थिति ये थी कि बैंकों का कर्ज लगातार बढ़ रहा था और आमदनी घटती जा रही थी. वेणुगोपाल धूत ने अपनी संपत्ति और बिजनेस के कुछ हिस्से बेचकर कर्ज चुकाने की कोशिश की, लेकिन कर्ज का पहाड़ इतना बड़ा हो चुका था कि उसे संभालना मुश्किल हो गया.
इस कहानी में एक और कड़वा मोड़ तब आया, जब बैंक धोखाधड़ी के आरोपों ने कंपनी की साख पर आखिरी चोट की. आईसीआईसीआई बैंक की तत्कालीन सीईओ चंदा कोचर के साथ मिलकर लोन लेने के मामले में विवाद खड़ा हो गया. जांच एजेंसियां पीछे पड़ गईं और जो कंपनी कभी भारत की शान हुआ करती थी, वो कानूनी पचड़ों में फंस गई. जिस औरंगाबाद की फैक्ट्री से हजारों लोगों का घर चलता था, वहां सन्नाटा पसरने लगा. शोरूमों से वीडियोकॉन के टीवी गायब होने लगे और सर्विस सेंटर्स बंद हो गए.
दिवालिया प्रक्रिया में खो गया धूत का कंट्रोल
आज वीडियोकॉन का वो पुराना गौरव कहीं खो गया है. वीडियोकॉन इंडस्ट्रीज़ (Videocon Industries) और वीडियोकॉन ग्रुप 2018 में भारी कर्ज के कारण इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया (दिवालिया) में चला गया था. यह प्रक्रिया लगभग 90,000 करोड़ रुपये तक की थी. दिवालिया प्रक्रिया की वजह से इसका कंट्रोल अब प्रमोटर्स के हाथ से निकल चुका है. एक समय 20 हजार करोड़ से ज्यादा की वैल्यू वाली ये कंपनी आज सिर्फ यादों में सिमट कर रह गई है. वेणुगोपाल धूत का वो सपना जिसने लाखों घरों को रोशन किया था, गलत फैसलों और हद से ज्यादा जोखिम लेने की वजह से बिखर गया.
Videocon d2h पर किसका कंट्रोल?
2018 में वीडियोकॉन डी2एच (Videocon d2h) का डिश टीवी (Dish TV) के साथ मर्जर पूरा हुआ था. इसके बाद Videocon d2h अलग कंपनी के रूप में नहीं बची, बल्कि पूरी तरह डिश टीवी में विलय हो गई. कंपनी का नाम डिश टीवी इंडिया लिमिटेड रहा, लेकिन d2h ब्रांड अभी भी इस्तेमाल होता है, जैसे d2h रिचार्ज, पैकेज आदि Dish TV के तहत चलते हैं. Videocon Group पर वेणुगोपाल धूत या उनके परिवार का कोई कंट्रोल नहीं है, क्योंकि वीडियोकॉन का मुख्य बिजनेस 2021 में वेदांता को मिल चुका है.


