घाघरा के पानी से बना घी.. ईंधन नहीं आज्ञा से चलती थी ट्रेन, थरथर कांपते थे अंग्रेज; जानें जंगली बाबा की अनोखी कहानी

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ब्रिटिश शासनकाल में भी बाबा की चर्चा कम न थी. एक बार बलिया जनपद के नरही थाना क्षेत्र अंतर्गत कोरंटाडीह जेल में उन्हें बंद कर दिया गया था. किंवदंतियों के अनुसार कुछ ही समय बाद वे जेल के बाहर विचरण करते दिखाई दिए. यह देखकर तो अंग्रेज अफसर के होश ही उड़ गए और भयभीत हो उठे थे. इसके बाद, बाबा को दोबारा छूने की हिम्मत फिरंगियों को नहीं हुई. इस मंदिर पर हर समय लोगों की भीड़ लगी रहती हैं.

बलिया: आजादी के आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाली यह बागी धरती संत महात्माओं की जन्मस्थली के साथ ही संत परंपराओ की साक्षी भी रही है. इसी में एक तेजस्वी जंगली बाबा का नाम भी लिया जाता है. मंदिर के पुजारी और स्थानीय श्रद्धालुओं के अनुसार बाबा का जन्म सेंगर क्षत्रिय वंश में बलिया जिले के रसड़ा तहसील अंतर्गत जाम गांव में हुआ था. बचपन से ही उनके चमत्कारों की चर्चा दूर-दूर तक फैलने लगी और बाद में चलकर जंगली बाबा एक महान सिद्ध संत के रूप में प्रख्यात हुए. आगे जानिए.

जंगली बाबा धाम सेवा ट्रस्ट के प्रबंधक और मंदिर के सेवक आचार्य राहुल उपाध्याय ने कहा कि, जंगली बाबा के कई अद्भुत चमत्कारों को बुजुर्ग लोगों ने अपने आंखों से देखा है जो बताते थे. बाबा का घी वाला चमत्कार बड़ा प्रसिद्ध है. सरयू नदी के पास कठोडा गांव है, जहां एक यज्ञ के दौरान भंडारे में घी कम पड़ गया था भक्त चिंतित थे. लेकिन बाबा बिल्कुल शांत थे. उन्होंने पास बह रही घाघरा नदी से पानी मंगवाया और कड़ाही में डलवाकर उसी से पूड़ियां बनवा दी. लेकिन बाद में बाबा रिफाइन मंगवाकर सरयू नदी को अर्पित भी कर दिए.

ब्रिटिश शासनकाल में भी बाबा की चर्चा कम न थी. एक बार बलिया जनपद के नरही थाना क्षेत्र अंतर्गत कोरंटाडीह जेल में उन्हें बंद कर दिया गया था. किंवदंतियों के अनुसार कुछ ही समय बाद वे जेल के बाहर विचरण करते दिखाई दिए. यह देखकर तो अंग्रेज अफसर के होश ही उड़ गए और भयभीत हो उठे थे. इसके बाद, बाबा को दोबारा छूने की हिम्मत फिरंगियों को नहीं हुई. इस मंदिर पर हर समय लोगों की भीड़ लगी रहती हैं.

अगला चर्चित चमत्कार जिगनी रेलवे स्टेशन पर बैठे बाबा ट्रेन में सवार हुए थे, मगर टिकट न होने पर टीटी ने उन्हें बीच रास्ते में उतार दिया. बाबा मुस्कराकर बोले, का रे कलिकवा. हमके छोड़ के जइबे तू?, फिर क्या यह कहते ही तुरंत ट्रेन रुक गई और आगे ही नहीं बढ़ पा रही थी. अंत में लोगों ने बताया कि, जिन्हें उतारा गया है वे सिद्ध पुरुष है. तब जाकर मामला शांत हुआ था. इस घटना का चर्चा आज भी बुजुर्ग बताते है.

उन्होंने आगे कहा कि, उनके परिवार की चार पीढ़ियां बाबा की सेवा में रही हैं. बाबा 16 वर्षों तक यहां अनवरत निवास किए और यहीं 1926 में समाधि लिए थे. धनतेरस के दिन लगने वाला मेला आज भी भक्ति का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करता है. यहां देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं, यहीं नहीं घर-घर में बाबा की तस्वीरो की पूजा की जाती है.



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