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Truth About Antidepressants: एंजायटी और डिप्रेशन की अधिकतर दवाएं सुरक्षित होती हैं, लेकिन ये दवाएं सिर्फ डॉक्टर की सलाह पर ही लेनी चाहिए. कुछ एंटी एंजायटी दवाएं गलत तरीके से या लंबे समय तक लेने पर डिपेंडेंसी पैदा कर सकती हैं. डॉक्टर की निगरानी में सही तरीके से लेने पर ये दवाएं प्रभावी और सुरक्षित रहती हैं. इनसे कोई नुकसान नहीं होता है.
अगर सही तरीके से एंजायटी और डिप्रेशन की दवाएं ली जाएं, तो कोई नुकसान नहीं होता है.
Anxiety & Depression Treatment: आजकल मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं. अधिकतर लोग इन परेशानियों को नजरअंदाज करते रहते हैं, लेकिन कुछ लोग मेंटल हेल्थ को लेकर सीरियस हो रहे हैं. जितना मेंटल हेल्थ को लेकर अवरेयरनेस बढ़ी है, उतनी ही इसकी दवाओं से जुड़ी भ्रांतियां बढ़ गई हैं. हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो इस वक्त एंजायटी और डिप्रेशन सबसे ज्यादा लोगों को प्रभावित कर रहे हैं. इनका इलाज दवाओं से किया जाता है. अक्सर माना जाता है कि एंजायटी और डिप्रेशन की दवाएं लेने से लोगों को इनकी लत लग जाती है या शरीर इन दवाओं पर डिपेंडेंट हो जाता है. हालांकि डॉक्टर्स इन सभी बातों को खारिज करते हैं और इन्हें मेंटल डिजीज के इलाज में असरदार और सुरक्षित बताते हैं.
नई दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज की प्रोफेसर और सीनियर साइकेट्रिस्ट डॉ. प्रेरणा कुकरेती ने News18 को बताया कि मेंटल डिजीज कई तरह की होती हैं और उनके इलाज में अलग-अलग दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है. डिप्रेशन और एंजायटी की दवाओं का असर होने में थोड़ा वक्त लगता है और लक्षणों से जल्द राहत दिलाने के लिए मरीजों को शुरुआत में बेंजोडायजेपाइन जैसी दवाएं दी जाती हैं. ये दवाएं जल्द असर दिखाती हैं और मरीजों को राहत मिलती है. हालांकि इन दवाओं को कम वक्त के लिए दिया जाता है और फिर ज्यादा सुरक्षित दवाएं लेने की सलाह दी जाती है. कई बार लोग अपनी मर्जी से बेंजोडायजेपाइन जैसी दवाएं लेते रहते हैं या गलत तरीके से यूज करते हैं, जिससे उनका ब्रेन इन पर डिपेंडेंट हो सकता है. अगर इन दवाओं का उपयोग सही तरीके और कम समय के लिए किया जाए, तो इनसे किसी तरह का नुकसान नहीं होता है.
डॉक्टर कुकरेती ने बताया कि एंजायटी और डिप्रेशन की दवाएं काफी सुरक्षित होती हैं और इनसे एडिक्शन जैसा कोई खतरा नहीं होता है. यह लोगों को सिर्फ भ्रम है कि ये दवाएं लेने से उन्हें आदत लग सकती है. जिस तरह डायबिटीज कंट्रोल करने के लिए लोगों को दवा लेनी पड़ती है, वैसे ही कुछ मरीजों का इलाज लंबा चलता है और उन्हें ये दवाएं लंबे समय तक लेनी पड़ती हैं. इसे डिपेंडेंसी या एडिक्शन समझना गलत है. इन दवाओं को लेकर समस्या तब शुरू होती है, जब मरीज डॉक्टर की निगरानी के बिना खुद ही इन दवाओं की मात्रा बढ़ा देते हैं या इन्हें महीनों तक अपनी मर्जी से लेते रहते हैं. किसी भी दवा को गलत तरीके से लेंगे, तो उसके साइड इफेक्ट जरूर देखने को मिलेंगे. इसलिए दवाओं को लेकर सावधानी बरतना जरूरी है.
एक्सपर्ट की मानें तो कई बार मरीज अपनी मर्जी से अचानक दवाएं बंद कर देते हैं, जिसके बाद उन्हें घबराहट, पसीना आना या चक्कर आने जैसे लक्षण महसूस होते हैं. इसे एंटीडिप्रेसेंट डिस्कन्टिन्युएशन सिंड्रोम कहा जाता है. ये दवाएं ब्रेन फंक्शन में बदलाव लाती हैं, इसलिए इन्हें अचानक बंद नहीं करना चाहिए. जब इन्हें अचानक बंद किया जाता है, तो मस्तिष्क को सामंजस्य बिठाने में समय लगता है. इसे अक्सर लोग विड्रॉल मान लेते हैं और लत समझ बैठते हैं. साइकेट्रिस्ट हमेशा सलाह देते हैं कि दवाओं को कभी भी अचानक बंद न करें, बल्कि उनकी खुराक को धीरे-धीरे कम किया जाना चाहिए. अगर प्रॉपर ट्रीटमेंट लेंगे, तो किसी भी दवा की न तो लत लगेगी और न ही शरीर को किसी तरह का नुकसान होगा.
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अमित उपाध्याय News18 Hindi की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें


