होली 2026: रंग खेलने से पहले क्यों की जाती है भगवान विष्णु, अग्नि देव, नरसिंह और शिव की आराधना? जानें क्या है मान्यता?

Date:

[ad_1]

Last Updated:

Holi 2026: होली का नाम लेते ही आंखों के सामने रंगों की बारिश, हंसी-ठिठोली और गुजिया की खुशबू तैरने लगती है, लेकिन अगर थोड़ा ठहरकर सोचें तो यह त्योहार सिर्फ रंग खेलने का मौका नहीं है. इसकी जड़ें पुरानी कथाओं, विश्वास और जीवन के गहरे संदेशों से जुड़ी हैं. 3 मार्च 2026 को देशभर में होली मनाई जाएगी और उससे पहले घरों में पूजा की तैयारियां जोरों पर हैं. कई लोग पूछते हैं कि होली पर आखिर किन देवताओं की पूजा करनी चाहिए और क्यों? दरअसल, होली का हर रंग एक कहानी कहता है-कहीं आस्था की जीत, कहीं प्रेम का उत्सव और कहीं संयम का संदेश. यही वजह है कि इस दिन अलग-अलग देवी-देवताओं की आराधना की परंपरा चली आ रही है.

होलिका दहन और भक्त की रक्षा का संदेश भगवान नरसिम्हा प्रह्लाद होलिका दहन की रात जब लकड़ियां जलती हैं और लोग अग्नि की परिक्रमा करते हैं, तब सिर्फ एक रस्म नहीं निभाई जाती, बल्कि एक कथा याद की जाती है. मान्यता है कि भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए भगवान ने नरसिम्हा रूप में प्रकट होकर अत्याचारी हिरण्यकशिपु का अंत किया था. आज भी कई परिवार होलिका दहन के समय नरसिम्हा की तस्वीर के सामने दीप जलाते हैं. बुजुर्ग कहते हैं, “आग में सिर्फ लकड़ी नहीं जलती, डर भी जलता है.” यह पूजा इस विश्वास से जुड़ी है कि सच्ची भक्ति और सच्चाई अंत में जीतती है.

संरक्षण और संतुलन के प्रतीक भगवान विष्णु होली की कथा में भगवान विष्णु का स्थान अहम माना जाता है. वे पालनहार हैं और संतुलन बनाए रखने वाले देवता के रूप में पूजे जाते हैं. कुछ परंपराओं में धुलेंडी के दिन विष्णु पूजा का विधान बताया गया है. गांवों में आज भी लोग रंग खेलने से पहले घर के मंदिर में दीप जलाते हैं. मान्यता है कि इससे जीवन में संतुलन और परिवार में सुख बना रहता है. त्योहार की मस्ती के बीच यह पूजा हमें याद दिलाती है कि खुशियों के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है.

शिव और आत्मसंयम का संदेश भगवान शिव होली का संबंध भगवान शिव की कथा से भी जोड़ा जाता है. कहा जाता है कि कामदेव ने जब तपस्या भंग करने की कोशिश की, तब शिव ने उन्हें भस्म कर दिया. बाद में करुणा से पुनर्जीवन का आशीर्वाद भी दिया. इस प्रसंग को लोग आत्मसंयम और संतुलन के प्रतीक के तौर पर देखते हैं. कई श्रद्धालु होली के दिन शिव मंदिर में जल चढ़ाते हैं. शहरों में भी सुबह-सुबह मंदिरों में भीड़ दिख जाती है, फिर उसके बाद रंगों का सिलसिला शुरू होता है.

Add News18 as
Preferred Source on Google

ब्रज की होली और कृष्ण भक्ति श्रीकृष्ण मथुरा वृंदावन ब्रज की होली की बात ही अलग है. मथुरा और वृंदावन में रंगों का उत्सव कई दिन पहले शुरू हो जाता है. लोककथाओं में बताया जाता है कि श्रीकृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ रंग खेलकर इस परंपरा की नींव रखी. यहां होली सिर्फ रंग नहीं, भक्ति का उत्सव है. मंदिरों में भजन, कीर्तन और फूलों की होली होती है. भक्तों के लिए यह प्रेम और समर्पण का मौका होता है. जो लोग एक बार ब्रज की होली देख लेते हैं, वे सालों तक उसकी चर्चा करते रहते हैं.

अग्नि और समृद्धि की कामना अग्निदेव होलिका दहन के समय अग्नि को साक्षी मानकर प्रार्थना की जाती है. अग्नि को शुद्धि और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है. कई घरों में इस मौके पर लक्ष्मी पूजन या घर की सुख-समृद्धि के लिए विशेष प्रार्थना भी की जाती है. ग्रामीण इलाकों में लोग नई फसल की बालियां अग्नि में अर्पित करते हैं. यह परंपरा खेती, प्रकृति और जीवन के चक्र से जुड़ी है.

त्योहार के पीछे छिपा संदेश होली सिर्फ रंगों का खेल नहीं है. यह आस्था, प्रेम, संयम और विश्वास का मेल है. नरसिम्हा की कथा हमें साहस देती है, विष्णु संतुलन का संदेश देते हैं, शिव संयम सिखाते हैं और कृष्ण प्रेम का रंग भरते हैं. धर्माचार्यों का कहना है कि पूजा का मतलब दिखावा नहीं, बल्कि भीतर की सफाई है. आज के दौर में जब त्योहार कभी-कभी शोर और दिखावे में बदल जाते हैं, तब इन कथाओं को याद करना जरूरी हो जाता है. होली मनाएं, रंग खेलें, हंसें-गाएं, लेकिन साथ में पर्यावरण और दूसरों की भावनाओं का भी ख्याल रखें. यही इस पर्व की असली खूबसूरती है.

न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें।

[ad_2]

Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Share post:

Subscribe

Popular

More like this
Related