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Kanpur Holi: कानपुर में होली का जश्न लंबा चलता है. होलिका दहन के दिन से ही रंग खेलने की शुरुआत हो जाती है. इसके बाद लोग रोज़ किसी-न-किसी बहाने रंग लगाते है और खुशियां बांटते है. कई व्यापारी इस समय का उपयोग अपने परिवार के साथ घूमने या आराम करने में करते है. पूरे साल की भागदौड़ के बाद यह त्योहार उनके लिए छुट्टी का मौका होता है.
कानपुरः होली का नाम सुनते ही रंग, गुलाल और मस्ती की छवि उभर आती है. लेकिन कानपुर में होली सिर्फ एक दिन का त्यौहार नहीं, बल्कि पूरे सात से आठ दिनों का उत्सव होता है. इस दौरान शहर की प्रमुख थोक बाजारें बंद रहती है. होली से एक दिन पहले बाजार बंद होते है और गंगा मेला के बाद ही खुलते है. हूलागंज, हटिया, नयागंज, एक्सप्रेस रोड, मूलगंज, कलेक्टरगंज और बर्तन बाजार जैसे बड़े थोक बाजार पूरी तरह बंद रहते हैं. आम दिनों में भारी भीड़ और जाम से भरी गलियों में होली के दौरान सन्नाटा छा जाता है.
व्यापारियों के अनुसार कानपुर में होली का जश्न लंबा चलता है. होलिका दहन के दिन से ही रंग खेलने की शुरुआत हो जाती है. इसके बाद लोग रोज़ किसी-न-किसी बहाने रंग लगाते है और खुशियां बांटते है. कई व्यापारी इस समय का उपयोग अपने परिवार के साथ घूमने या आराम करने में करते है. पूरे साल की भागदौड़ के बाद यह त्योहार उनके लिए छुट्टी का मौका होता है.
गंगा मेला से जुड़ी परंपरा
कानपुर में होली का समापन गंगा मेला के साथ होता है, जो होली के सातवें दिन मनाया जाता है. इसके अगले दिन बाजार सामान्य रूप से खुलने लगते है. व्यापार मंडल के पदाधिकारियों के अनुसार, यह परंपरा बहुत पुरानी है. बताया जाता है कि अंग्रेजों के समय कुछ युवकों को रंग खेलने पर जेल में बंद कर दिया गया था. इसके विरोध में शहर के लोगों और व्यापारियों ने अपने प्रतिष्ठान बंद कर दिए थे. युवकों की रिहाई के बाद लोगों ने फिर से रंग खेला, लेकिन दुकानें बंद रहीं। तभी से यह परंपरा चल पड़ी.
पूरे देश में अनोखी मिसाल
व्यापारियों का कहना है कि शायद ही देश के किसी अन्य शहर में होली पर इतनी लंबी बंदी होती हो. कानपुर की यह परंपरा आज भी उसी उत्साह के साथ निभाई जाती है. गंगा मेला के बाद बाजार खुलते ही फिर से वही भीड़, वही रौनक और वही कारोबार शुरू हो जाता है. लेकिन इन आठ दिनों तक कानपुर सच में रंग, उमंग और त्योहार की मस्ती में डूबा नजर आता है.
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