रांची से साउथ ईस्ट एशिया तक, देसी प्रोटीन पाउडर ने बनाई वैश्विक पहचान

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झारखंड की राजधानी रांची के युवा उद्यमी कमलेश ने अपने नवाचार से हेल्थ सप्लीमेंट बाजार में नई पहचान बनाई है. उन्होंने मशरूम से तैयार एक प्राकृतिक ‘देसी प्रोटीन पाउडर’ लॉन्च किया है, जो न केवल किफायती है बल्कि महंगे विदेशी व्हे-प्रोटीन को भी चुनौती दे रहा है. अपने स्टार्टअप “शरूमक्राफ्ट” के जरिए वे सालाना लाखों का कारोबार कर रहे हैं और अब उनका यह मेड इन इंडिया प्रोडक्ट साउथ ईस्ट एशिया के बाद अमेरिका तक पहुंचने की तैयारी में है. रिपोर्ट- शिखा श्रेया

झारखंड की राजधानी रांची के एक युवा उद्यमी कमलेश ने अपनी सूझबूझ और नवाचार से स्वास्थ्य सप्लीमेंट के बाजार में हलचल मचा दी है. उन्होंने मशरूम से एक ऐसा ‘देसी प्रोटीन पाउडर’ तैयार किया है, जिसकी चमक अब सात समंदर पार तक पहुंच चुकी है.

अपने स्टार्टअप “शरूमक्राफ्ट” के जरिए कमलेश न केवल सालाना 50 लाख रुपये से अधिक का टर्नओवर कर रहे हैं, बल्कि महंगे और केमिकल युक्त विदेशी प्रोटीन पाउडर्स को कड़ी चुनौती भी दे रहे हैं.

कमलेश के अनुसार, बाजार में उपलब्ध अधिकांश व्हे-प्रोटीन और मिल्क प्रोटीन न केवल महंगे होते हैं, बल्कि कई बार उनके सेवन से किडनी और लीवर पर बुरा प्रभाव पड़ने की खबरें भी आती हैं. इसके उलट, उनका मशरूम प्रोटीन पाउडर पूरी तरह प्राकृतिक, लैब-टेस्टेड और सुरक्षित है.

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जहां बाजार में अच्छे प्रोटीन के लिए लोगों को ₹3000 तक खर्च करने पड़ते हैं, वहीं शरूमक्राफ्ट का यह देसी विकल्प मात्र ₹500-600 की रेंज में उपलब्ध है. यह विशेष रूप से उन शाकाहारी लोगों और जिम जाने वाले युवाओं के लिए वरदान है, जो प्राकृतिक तरीके से अपनी प्रोटीन की जरूरत पूरी करना चाहते हैं.

इस प्रोटीन पाउडर की खासियत इसकी उच्च गुणवत्ता है. कमलेश का दावा है कि इसके मात्र एक चम्मच सेवन से शरीर को 30 से 35 ग्राम तक प्रोटीन मिल जाता है, जो एक व्यक्ति के दैनिक कोटे का लगभग 60% हिस्सा पूरा कर देता है. इसकी उपयोगिता केवल जिम तक सीमित नहीं है; महिलाएं इसे साधारण आटे में मिलाकर रोटियां भी बना रही हैं, जिससे बच्चों और बुजुर्गों को आसानी से पोषण मिल रहा है. इसके अलावा, वे सूखा मशरूम भी बेचते हैं, जिसे दो साल तक सुरक्षित रखा जा सकता है.

कमलेश की सफलता की कहानी अब रांची की गलियों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गई है. उनके उत्पाद वर्तमान में साउथ ईस्ट एशियाई देशों में एक्सपोर्ट किए जा रहे हैं. सफलता का ग्राफ यहीं नहीं थमता; अब वे अपने इस ‘मेड इन इंडिया’ प्रोटीन को अमेरिका भेजने की तैयारी में हैं. जिसके लिए अंतिम दौर की बातचीत चल रही है.

भारत से ज्यादा विदेशों में इस ऑर्गेनिक प्रोटीन की मांग ने यह साबित कर दिया है कि अगर उत्पाद में गुणवत्ता हो, तो स्थानीय स्तर पर शुरू किया गया व्यवसाय भी वैश्विक पहचान बना सकता है.

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