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बदलते कृषि परिदृश्य में मधुमक्खी पालन तेजी से किसानों और ग्रामीण युवाओं के लिए कम लागत में अच्छा मुनाफा देने वाला व्यवसाय बनकर उभर रहा है. हालांकि, कई लोग इसकी शुरुआत तो करते हैं, लेकिन शुरुआती चुनौतियों और सही जानकारी के अभाव में कुछ ही महीनों में इसे छोड़ भी देते हैं. बिहार में भी बड़ी संख्या में किसान बी-बॉक्स के माध्यम से मधुमक्खी पालन कर रहे हैं, कदमहिया गांव निवासी सुमन देवी और उनके पति सत्येंद्र सिंह. ये दंपत्ति पिछले तीन वर्षों से मधुमक्खी पालन का काम कर रहे हैं. ऐसे में कुछ सफल मधुमक्खी पालक अपने अनुभव और सही तकनीकों के जरिए इस व्यवसाय से अच्छी आमदनी कमा रहे हैं.
पश्चिम चम्पारण. हर साल सैकड़ों लोग मधुमक्खी पालन और शहद उत्पादन का कार्य शुरू करते हैं, लेकिन शुरुआत के कुछ महीनों बाद उनका धैर्य जवाब देने लगता है और वो उसे बीच में ही छोड़ देते हैं. बिहार में भी हजारों किसान बी बॉक्सेस में मधुमक्खी पालन करते हैं, लेकिन इससे उस स्तर का लाभ नहीं बना पाते हैं जिसकी कल्पना से उन्होंने इसकी शुरुआत की होती है. किसान सहित अन्य मधुमक्खी पालकों की इसी समस्या के समाधान के लिए हमने कुछ ऐसे मधुमक्खी पालकों से उनके काम के तरीके पर बात की है, जिन्हें इस कारोबार में महारथ हासिल है. आंकड़ों से समझें तो ढाई लाख रुपए का इन्वेस्ट कर वो हर साल साढ़े चार से पांच लाख रुपए की आमदनी कर रहे हैं.
इन्हीं सफल मधुमक्खी पालकों में से एक हैं पश्चिम चंपारण जिले के बगहा 02 प्रखंड अंतर्गत आने वाले कदमहिया गांव निवासी सुमन देवी और उनके पति सत्येंद्र सिंह. ये दंपत्ति पिछले तीन वर्षों से मधुमक्खी पालन का काम कर रहे हैं. शुरुआत में उद्यान विभाग से प्रशिक्षण लेकर उन्होंने अपना कारोबार शुरू किया. वर्तमान में इनके पास कुल 50 बॉक्सेस हैं, जिनमें मधुमक्खियों का पालन होता है. मजे की बात यह है कि इन बॉक्सेस से हर महीने औसतन 70 से 100 किलो तक शहद की हार्वेस्टिंग बड़ी आसानी से कर ली जाती है. हार्वेस्टिंग के बाद उसे शीशी में पैक कर लेबलिंग की जाती है और फिर बाजार में 500 रुपए किलो की भाव से बेच दिया जाता है.
साल के 08 महीने होती है हार्वेस्टिंग
फरवरी से मई महीने के दौरान 50 बॉक्सेस से करीब 150 किलो शहद प्रति महीने के हिसाब से हार्वेस्टिंग की जाती है. जून से सितंबर तक बरसात के दौरान शहद हार्वेस्टिंग को बंद कर दिया जाता है. फिर नवंबर से जनवरी तक हर महीने करीब 100 किलो तक शहद की हार्वेस्टिंग की जाती है. इस प्रकार शहद हार्वेस्टिंग का यह सिलसिला साल के 08 महीने तक चलता है.
लागत से डबल मुनाफा
सत्येंद्र बताते हैं कि वर्तमान में उनके पास कुल 50 बॉक्सेस हैं, जिसकी खरीदारी उन्होंने 4500 रुपए प्रति बॉक्स के हिसाब से की थी. यानी दो लाख पच्चीस हज़ार रुपए की लागत. फरवरी से मई माह तक हर महीने 150 किलो शहद के हिसाब से करीब 600 किलो शहद की हार्वेस्टिंग और नवंबर से जनवरी तक कुल 300 किलो शहद की हार्वेस्टिंग. कुल मिलकर साल में 900 किलो शहद की हार्वेस्टिंग पक्की है, जिसे 500 रुपए प्रति किलो की दर से बेचने पर 4 लाख 50 हजार रुपए की आमदनी होती है.
1000 रुपए प्रति किलो की भाव तक बिकता है शुद्ध शहद
यदि हम लागत के ढाई लाख रुपए भी मानते हैं, तब भी 08 महीने में दो लाख रुपए का मुनाफा पक्का हो जाता है. मजे की बात यह है कि इस शहद की शुद्धता को देखते हुए कई कारोबारी इसे 1000 रुपए किलो की दर से भी बेचते हैं. अब इससे आप अनुमान लगा सकते हैं कि इस कारोबार को यदि बेहतर ढंग से बड़े स्तर पर किया जाए तो आमदनी का हिसाब क्या हो सकता है.
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