Dharohar: चारमीनार की छाया में बसी इतिहास की विरासत, मक्का मस्जिद में हैं कई निजामों के मकबरे

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इंडो-इस्लामिक वास्तुकला का अद्भुत नमूना है यह मस्जिद, कई निजामों के हैं मकबरे

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Dharohar Makkah Masjid Hyderabad: मक्का मस्जिद हैदराबाद की ऐतिहासिक धरोहरों में से एक है, जिसका निर्माण 17वीं शताब्दी में कुतुब शाही शासक मुहम्मद कुतुब शाह ने शुरू करवाया था और बाद में मुगल सम्राट औरंगजेब ने इसे पूरा कराया. मस्जिद परिसर में स्थित शाही कब्रिस्तान इंडो-इस्लामिक वास्तुकला का शानदार उदाहरण है. यहां आसफ जाही वंश के कई निज़ामों की मज़ारें मौजूद हैं. संगमरमर की जालीदार नक्काशी और शांत वातावरण के कारण यह स्थान पर्यटकों और इतिहासकारों के लिए भी खास आकर्षण का केंद्र बना हुआ है.

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हैदराबाद. चारमीनार की परछाईं में खड़ी ऐतिहासिक मक्का मस्जिद न केवल अपनी भव्यता और इबादत के लिए मशहूर है, बल्कि यह हैदराबाद के शासकों आसफ जाही राजवंश की अंतिम विश्रामस्थली भी मानी जाती है. मस्जिद के दक्षिणी छोर पर स्थित सफेद संगमरमर की मज़ारें आज भी उस दौर की याद दिलाती हैं, जब हैदराबाद रियासत की गिनती दुनिया की सबसे अमीर रियासतों में होती थी. यह परिसर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इतिहास और वास्तुकला के लिहाज से भी खास पहचान रखता है.

‘मोरक्कन हैदराबाद’ नामक पुस्तक के अनुसार मक्का मस्जिद का निर्माण 17वीं शताब्दी में कुतुब शाही वंश के सुल्तान मुहम्मद कुतुब शाह ने शुरू करवाया था. बाद में मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल में इसका निर्माण कार्य पूरा हुआ. हालांकि मस्जिद परिसर में मौजूद शाही कब्रिस्तान का संबंध आसफ जाही वंश और हैदराबाद के निज़ामों से है. वर्ष 1914 में छठे निज़ाम मीर महबूब अली खान के शासनकाल के दौरान यहां एक भव्य आयताकार गलियारा बनवाया गया था. इसी गलियारे में निज़ाम वंश के कई शासकों को सुपुर्द-ए-खाक किया गया.

मक्का मस्जिद परिसर में स्थित शाही कब्रिस्तान में निजामों के मकबरे

मक्का मस्जिद परिसर में स्थित इस शाही कब्रिस्तान में आसफ जाही वंश के अधिकांश शासकों की मज़ारें मौजूद हैं. यहां मुख्य रूप से हैदराबाद के दूसरे निज़ाम, निज़ाम अली खान से लेकर छठे निज़ाम मीर महबूब अली खान तक के मकबरे स्थित हैं. शासकों के अलावा उनके परिवार के सदस्यों और बेगमों की कब्रें भी इसी परिसर में बनाई गई हैं. हाल के वर्षों में भी इस कब्रिस्तान का महत्व बना रहा. जनवरी 2023 में हैदराबाद के आठवें और अंतिम नाममात्र के निज़ाम मुकर्रम जाह को उनकी वसीयत के अनुसार इसी पारिवारिक कब्रिस्तान में दफनाया गया था. इससे इस ऐतिहासिक स्थल का महत्व और बढ़ गया.

इंडो-इस्लामिक वास्तुकला का है बेहतरीन नमूना

हालांकि सभी निज़ामों की कब्रें यहां नहीं हैं. आसफ जाही वंश के संस्थापक और पहले निज़ाम निज़ाम-उल-मुल्क की कब्र इस परिसर में नहीं है. उन्हें औरंगाबाद के पास स्थित खुलदाबाद में दफनाया गया था. वहीं सातवें निज़ाम मीर उस्मान अली खान ने अपने लिए किंग कोठी स्थित जूडी मस्जिद को अंतिम विश्रामस्थल के रूप में चुना था. सफेद संगमरमर से बनी इन मज़ारों को इंडो-इस्लामिक वास्तुकला का बेहतरीन नमूना माना जाता है. इन पर की गई जालीदार नक्काशी और परिसर का शांत वातावरण पर्यटकों, इतिहासकारों और जायरीन को खास तौर पर आकर्षित करता है.

मक्का मस्जिद आने वाले लोग अक्सर इन मज़ारों पर रुककर हैदराबाद के पूर्व शासकों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं. यह स्थान इस बात की याद दिलाता है कि हैदराबाद की संस्कृति, विरासत और आधुनिक विकास की नींव रखने वाले शासकों का इस मस्जिद से कितना गहरा और आध्यात्मिक जुड़ाव रहा है.

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deep ranjan

दीप रंजन सिंह 2016 से मीडिया में जुड़े हुए हैं. हिंदुस्तान, दैनिक भास्कर, ईटीवी भारत और डेलीहंट में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. 2022 से News18 हिंदी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. एजुकेशन, कृषि, राजनीति, खेल, लाइफस्ट…और पढ़ें

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