कंगाली से 300 करोड़ के साम्राज्य तक, 12वीं पास शुभम गुप्ता की जीरो से हीरो बनने की दास्तां

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नई दिल्‍ली. ज्‍यादातर लोगों का मानना है कि सफलता की कहानियां बड़े कॉलेज, चमकदार डिग्रियों और आलीशान दफ्तरों से शुरू होती हैं. लेकिन, उनकी यह सोच पूरी तरह सही नहीं है. कुछ सक्‍सेस स्‍टोरीज संघर्ष, असफलता और टूटे सपनों की ‘राख’ से जन्म लेती हैं. संघर्ष से उपजी ऐसी ही एक कहानी है शुभम गुप्‍ता की. 300 करोड़ के स्‍ट्रीट वीयर ब्रांड ‘बॉन्कर्स कॉर्नर’ (Bonkers Corner) के संस्‍थापक शुभम गुप्‍ता का रास्‍ता बार-बार मुश्किलों ने रोका, लेकिन उन्‍होंने हार नहीं मानी और महज 30 साल की उम्र में ही वो मुकाम हासिल कर‍ लिया, जिसकी कल्‍पना करना भी अधिकतर लोगों के लिए मुश्किल है.

मुंबई के मध्‍यवर्गीय परिवार में जन्‍में शुभम गुप्‍ता के पिता का टेक्‍सटाइल का कारोबार था. परिवार का गुजारा ठीक चल रहा था, लेकिन, 2011 में फैमिली पर संकट आना शुरू हुआ. उस समय शुभम ने 12वीं पास की थी और कॉलेज में दाखिल लेने की तैयारी में थे. लेकिन, पिता का व्‍यापार डूब रहा था और एक दिन उनका परिवार दिवालीया हो गया. घर की आर्थिक सुरक्षा एक पल में खत्म हो गई थी और कॉलेज की महंगी डिग्री अब एक दूर का सपना बन चुकी थी.

संघर्ष से सफलता

शुभम के पास दो रास्ते थे. या तो परिस्थितियों के आगे घुटने टेक दें या फिर शून्य से शुरुआत करें. उन्होंने दूसरा रास्ता चुना. उन्होंने छोटे-मोटे पार्ट-टाइम काम शुरू किए. इस दौरान उन्होंने गौर किया कि भारतीय युवाओं के बीच ‘स्ट्रीटवियर’ और कूल ग्राफिक्स वाली टी-शर्ट्स का क्रेज बढ़ रहा है. अपनी मामूली बचत से उन्होंने स्थानीय बाजारों से बेसिक टी-शर्ट्स खरीदीं और उन्हें बेचना शुरू किया.

2014 में शुरू किया बॉन्‍कर्स कॉर्नर

साल 2014 में शुभम के इस अटूट संघर्ष को एक औपचारिक नाम मिला, Bonkers Corner. शुभम ने वह नब्ज पकड़ ली थी जिसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनियां नहीं समझ पा रही थीं. उन्होंने महसूस किया कि नई पीढ़ी (Gen-Z) को सिर्फ कपड़े नहीं, बल्कि एक ‘एटीट्यूड’ चाहिए. उन्हें ऐसा पहनावा चाहिए जो रॉ (Raw), असली और उनके व्यक्तित्व को बयां करने वाला हो. बिना किसी बड़े निवेश या भारी मार्केटिंग बजट के, शुभम ने एक-एक ऑर्डर के साथ इस ब्रांड की नींव रखी. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय डिजाइनों की नकल करने के बजाय ‘देसी स्ट्रीट स्टाइल’ को प्राथमिकता दी, जो किफायती भी था और हाई-क्वालिटी भी.

आत्मविश्वास ने जीता शार्क्स का दिल

शुभम की मेहनत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब वे Shark Tank India के सेट पर पहुंचे, तो उनकी कंपनी पहले ही 100 करोड़ रुपये का राजस्व (Revenue) कमा रही थी और 140 करोड़ के आंकड़े की ओर तेजी से बढ़ रही थी. जब उन्होंने अनुपम मित्तल (Anupam Mittal) और नमिता थापर (Namita Thapar) जैसे दिग्गजों के सामने अपनी कंपनी की वैल्यूएशन 300 करोड़ रुपये बताई, तो पूरा सेट दंग रह गया.

अनुपम मित्तल का सवाल सीधा था, “जब आप पहले से ही 30 करोड़ रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं, तो आपको हमारी जरूरत क्यों है?” शुभम का जवाब उनके शांत आत्मविश्वास को दर्शाता था. उन्होंने स्पष्ट किया कि वे केवल पैसों के लिए नहीं, बल्कि बेहतर लॉजिस्टिक्स, आईटी सिस्टम और रणनीतिक साझेदारी के लिए आए हैं. उनकी ईमानदारी और स्पष्ट सोच ने नमिता थापर को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने बिना किसी कड़े मोलभाव के वही ऑफर स्वीकार कर लिया जो शुभम चाहते थे.

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