क्या ब्लड टेस्ट से भी लगाया जा सकता है किडनी स्टोन का पता? एक्सपर्ट क्यों देते हैं अल्ट्रासाउंड की सलाह

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Blood Tests for Kidney Stone: किडनी स्टोन का पता लगाने के लिए सिर्फ ब्लड टेस्ट काफी नहीं है. यह टेस्ट शरीर में कैल्शियम, यूरिक एसिड और किडनी फंक्शन के बारे में जानकारी देता है, जबकि अल्ट्रासाउंड पथरी के सटीक आकार, जगह और उसके कारण होने वाली सूजन के बारे में समझने में मदद करता है. अल्ट्रासाउंड से किडनी स्टोन डिटेक्ट करना आसान है.

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किडनी स्टोन का पता लगाने के लिए अल्ट्रासाउंड सबसे अच्छा तरीका है.

Ways To Detect Kidney Stones: किडनी स्टोन की समस्या युवाओं में तेजी से बढ़ रही है. कई बार स्टोन छोटा होता है, तो उसका लोगों को पता ही नहीं चलता है. जब स्टोन निकलता है या पेशाब की नली में फंस जाता है, तब जाकर लोगों को किडनी स्टोन का पता चलता है. जब शरीर में कैल्शियम, ऑक्सालेट और यूरिक एसिड जैसे मिनरल्स की मात्रा बढ़ जाती है, तो वे आपस में जुड़कर छोटे-छोटे क्रिस्टल बना लेते हैं, जो बाद में पथरी का रूप ले लेते हैं. मरीजों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या केवल एक सामान्य ब्लड टेस्ट के जरिए इस पथरी का पता लगाया जा सकता है? अगर ब्लड टेस्ट से किडनी स्टोन का पता लगाया जा सकता है, फिर डॉक्टर अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह क्यों देते हैं? इन सभी सवालों के जवाब डॉक्टर से जान लेते हैं.

नई दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल के यूरोलॉजी डिपार्टमेंट के वाइस चेयरमैन डॉ. अमरेंद्र पाठक ने News18 को बताया कि ब्लड टेस्ट से किडनी स्टोन को डिटेक्ट करना मुश्किल है. ब्लड टेस्ट के जरिए खून में मौजूद कैल्शियम या यूरिक एसिड का स्तर पता चल जाता है. अगर इन दोनों का स्तर सामान्य से अधिक हैं, तो यह किडनी स्टोन का संकेत हो सकता है. हालांकि सिर्फ इसी आधार पर स्टोन कंफर्म नहीं हो सकता है. ब्लड टेस्ट से किडनी फंक्शन, क्रिएटिनिन लेवल, इंफेक्शन समेत कई बातों का पता लगाया जा सकता है. अगर पथरी के कारण मूत्र मार्ग में रुकावट आ रही है, तो खून में क्रिएटिनिन और यूरिया का स्तर बढ़ सकता है, जो किडनी पर पड़ रहे दबाव को दर्शाता है. ब्लड टेस्ट से यह पता चलता है कि क्या पथरी की वजह से शरीर में कोई आंतरिक संक्रमण तो नहीं फैल रहा है. हालांकि ये टेस्ट केवल इनडायरेक्ट संकेत ही देते हैं.

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यूरोलॉजिस्ट ने बताया कि किडनी स्टोन का पता लगाने के लिए अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह दी जाती है. इसमें किडनी, यूरेटर और ब्लैडर की वास्तविक तस्वीरें बनती हैं. इससे किडनी स्टोन डिटेक्ट हो जाता है और उसकी संख्या, साइज और लोकेशन भी स्पष्ट हो जाती है. यह जानकारी केवल अल्ट्रासाउंड या सीटी स्कैन से ही संभव है. अल्ट्रासाउंड की सलाह देने का एक बड़ा कारण हाइड्रोनेफ्रोसिस की पहचान करना भी है. कई बार छोटी पथरी भी मूत्र मार्ग को ब्लॉक कर देती है, जिससे किडनी में पेशाब भरने लगता है और सूजन आ जाती है. ब्लड टेस्ट इस सूजन को नहीं देख सकता, लेकिन अल्ट्रासाउंड में यह तुरंत पकड़ में आ जाता है. अगर समय रहते इस रुकावट का पता न चले, तो किडनी को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है.

डॉक्टर के मुताबिक ब्लड टेस्ट और अल्ट्रासाउंड दोनों मिलकर डॉक्टर को यह तय करने में मदद करते हैं कि मरीज को दवाओं की जरूरत है या सर्जरी की. अगर अल्ट्रासाउंड में पथरी छोटी और सुरक्षित जगह पर दिखती है, तो डॉक्टर केवल पानी और दवाओं से उसे निकालने की कोशिश करते हैं. अगर ब्लड टेस्ट में संक्रमण के लक्षण दिखें और अल्ट्रासाउंड में पथरी का आकार बड़ा हो, तो तुरंत मेडिकल ट्रीटमेंट की जरूरत होती है. ये दोनों ही टेस्ट किडनी से जुड़ी समस्याओं का पता लगाने के लिए जरूरी होते हैं. ब्लड टेस्ट शरीर की केमिस्ट्री बताता है, जबकि अल्ट्रासाउंड शरीर की ज्योग्राफी समझने में मदद करता है.

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अमित उपाध्याय

अमित उपाध्याय News18 Hindi की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें

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