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मशहूर गीतकार साहिर लुधियानवी की यात्रा स्ट्रगल और विद्रोह की एक अनूठी कहानी है. एक जागीरदार परिवार में जन्मे साहिर ने माता-पिता के अलग होने के बाद भीषण गरीबी देखी और नौकरी के लिए दर-दर भटके. उनकी पहली किताब ‘तल्खियां’ ने उन्हें उर्दू शायरी का चमकता सितारा बना दिया. साल 1951 में फिल्म ‘नौजवान’ और ‘बाजी’ से उन्हें बॉलीवुड में पहचान मिली. उनके गीतों में रोमांस के साथ-साथ सामाजिक सच्चाई का गहरा संगम था. ‘प्यासा’ और ‘साधना’ जैसे क्लासिक्स के जरिए उन्होंने फिल्मी गानों को साहित्य की ऊंचाइयों तक पहुंचाया, जो आज भी असरदार हैं.
साहिर लुधियानवी का असली नाम अब्दुल हई था. (फोटो साभार: IANS)
नई दिल्ली: हिंदी सिनेमा के इतिहास में साहिर लुधियानवी एक ऐसा नाम है, जिनकी शायरी ने न केवल फिल्मों को सजाया, बल्कि समाज को आइना भी दिखाया. 8 मार्च को उनकी जयंती है और यह दिन हमें उस फनकार की याद दिलाता है जिसने फैज और फिराक जैसे दिग्गजों के दौर में अपनी एक अलग पहचान बनाई. साहिर का असली नाम अब्दुल हई था और उनका जन्म लुधियाना के एक रईस जागीरदार परिवार में हुआ था. लेकिन किस्मत ने ऐसी करवट बदली कि माता-पिता के अलग होने के बाद उन्हें अपनी मां के साथ दर-दर की ठोकरें खानी पड़ीं. जिस लड़के ने कभी अमीरी देखी थी, उसे पेट पालने के लिए छोटी-मोटी नौकरियां ढूंढनी पड़ीं और उर्दू अखबारों में संपादन तक करना पड़ा. गरीबी और तंगी के इसी दौर ने साहिर के अंदर उस ‘विद्रोह’ को जन्म दिया, जो बाद में उनके गीतों की जान बना.
‘तल्खियां’ की कामयाबी
साहिर लुधियानवी का असली जादू साल 1945 में तब दुनिया के सामने आया, जब उनकी पहली किताब ‘तल्खियां’ छपी. इस किताब ने उन्हें रातों-रात उर्दू शायरी का चमकता सितारा बना दिया. इसके बाद, साल 1949 में वह अपनी किस्मत आजमाने मुंबई पहुंचे. शुरुआत आसान नहीं थी. उन्होंने डायलॉग राइटर के तौर पर काम शुरू किया, लेकिन उनके टैलेंटे को पहचान तब मिली, जब 1951 में फिल्म ‘नौजवान’ में उन्हें बड़ा ब्रेक मिला. सचिन देव बर्मन के संगीत और साहिर के बोलों ने ऐसी धुन छेड़ी कि लोग दीवाने हो गए. इसके बाद, गुरु दत्त की फिल्म ‘बाजी’ और ‘प्यासा’ जैसी कालजयी फिल्मों ने उन्हें फिल्म जगत के सबसे बड़े गीतकारों की कतार में खड़ा कर दिया. उन्होंने साबित कर दिया कि फिल्मी गाने महज तुकबंदी नहीं, बल्कि उच्च कोटि का साहित्य हो सकते हैं.
समाज का कड़वा सच थे उनके गीत
साहिर लुधियानवी सिर्फ रोमांस के कवि नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे संवेदनशील रचनाकार थे जो समाज की कुरीतियों पर करारी चोट करते थे. ‘तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा’ जैसे बोल आज के दौर में भी उतने ही सच लगते हैं जितने तब थे. उन्होंने ‘साधना’ जैसी फिल्मों में महिलाओं के शोषण पर सवाल उठाए, तो ‘गुमराह’ में प्यार की पेचीदगियों को ‘चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों’ जैसे शब्दों में पिरोया. उनके गीतों में एक तरफ ‘प्यासा’ की उदासी थी, तो दूसरी तरफ ‘नया दौर’ की प्रगतिशीलता. साहिर ने अपने स्ट्रगल को शब्दों में ढालकर हमें वह विरासत दी है, जो आने वाली कई सदियों तक फैंस के दिलों में धड़कती रहेगी.
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अभिषेक नागर News 18 Digital में Senior Sub Editor के पद पर काम कर रहे हैं. वे News 18 Digital की एंटरटेनमेंट टीम का हिस्सा हैं. वे बीते 6 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. वे News 18 Digital से पहल…और पढ़ें
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