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मुजफ्फरपुर स्थित बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय (बीआरएबीयू) के जंतु विज्ञान विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. मनेन्द्र कुमार के नेतृत्व में विकसित बायो-एकॉस्टिक्स एनिमल मॉनिटरिंग डिवाइस को यूनाइटेड किंगडम से डिजाइन पेटेंट की स्वीकृति मिली है.
बिहार की वैज्ञानिक क्षमता और नवाचार ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है. मुजफ्फरपुर स्थित बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय (बीआरएबीयू) के जंतु विज्ञान विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. मनेन्द्र कुमार के नेतृत्व में विकसित बायो-एकॉस्टिक्स एनिमल मॉनिटरिंग डिवाइस को यूनाइटेड किंगडम से डिजाइन पेटेंट की स्वीकृति मिली है. इस उपलब्धि को वन्यजीव संरक्षण, जैव-विविधता अनुसंधान और सतत पारिस्थितिकी निगरानी के क्षेत्र में एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है.
प्रो. मनेन्द्र कुमार ने बताया कि यह उपकरण जैव-ध्वनिकी तकनीक पर आधारित है, जिसमें जीव-जंतुओं द्वारा उत्पन्न ध्वनियों का विश्लेषण कर उनकी पहचान, संख्या, गतिविधि और व्यवहार का अध्ययन किया जाता है. पारंपरिक निगरानी विधियां जैसे मैनुअल सर्वे, कैमरा ट्रैप या जीपीएस कॉलर कई बार महंगे, श्रमसाध्य और पशुओं के स्वाभाविक व्यवहार में हस्तक्षेप करने वाले होते है. इसके विपरीत यह नया उपकरण कम हस्तक्षेप वाला, दीर्घकालिक और अधिक प्रभावी समाधान प्रदान करता है.
वैज्ञानिक प्रतिभा को अंतरराष्ट्रीय पहचान
डिवाइस में उच्च-संवेदनशील माइक्रोफोन की उन्नत श्रृंखला लगी है, जो हाथियों की निम्न-आवृत्ति वाली आवाजों से लेकर कीटों की उच्च-आवृत्ति ध्वनियों तक रिकॉर्ड करने में सक्षम है। इससे बड़े और सूक्ष्म दोनों प्रकार के जीवों की एक साथ निगरानी संभव हो पाती है, जो जैव-विविधता के व्यापक अध्ययन में बेहद उपयोगी है.इस उपकरण की एक बड़ी खासियत इसमें लगा एआई आधारित पैटर्न-रिकग्निशन सॉफ्टवेयर है. यह जंगल के प्राकृतिक शोर—जैसे हवा, बारिश और पत्तियों की आवाज—को छांटकर पशुओं की ध्वनियों की सटीक पहचान करता है. कम ऊर्जा खपत वाला माइक्रोप्रोसेसर और उन्नत नॉइज-फिल्टरिंग प्रणाली डेटा की विश्वसनीयता को और बढ़ाती है.
यूके से मिला डिजाइन पेटेंट
दुर्गम क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए डिवाइस को पूरी तरह मौसमरोधी बनाया गया है। शीर्ष पर लगे सोलर पैनल इसे लंबे समय तक बिना रखरखाव के संचालित करने में सक्षम बनाते हैं. वायरलेस डेटा ट्रांसमिशन के माध्यम से यह उपकरण वास्तविक समय में केंद्रीय डेटाबेस तक जानकारी भेजता है.इस नवाचार के विकास में एक संयुक्त वैज्ञानिक टीम का योगदान रहा, जिसमें शोध छात्र राहुल कुमार, डॉ. सोनू कुमार और डॉ. कुमार बलवंत शामिल हैं. यूके से मिले डिजाइन पेटेंट के बाद यह तकनीक वैश्विक संरक्षण परियोजनाओं में नई दिशा देने की क्षमता रखती है और लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण में मील का पत्थर साबित हो सकती है.
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