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सुल्तानपुर में कई ऐसे फेमस व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने न सिर्फ सुल्तानपुर में अपना परचम लहराया, बल्कि वह देश और दुनिया में भी सुल्तानपुर के नाम को रोशन किया. आज उन्हीं में हम ऐसे पांच व्यक्तित्व के बारे में जानेंगे, जो खेल, शिक्षा, साहित्य और राजनीति से जुड़े हुए हैं. जिन्होंने सुल्तानपुर को दुनिया में एक अलग पहचान दिलाई है.
अजमल सुल्तानपुरी उर्दू भाषा के एक महान कवि हुआ करते थे, जिन्होंने सुल्तानपुर को राष्ट्रीय स्तर की पहचान दिलाई. उनके द्वारा लिखी गई कई कविताएं आज भी लोगों के बीच पढ़ी जाती हैं. उनके द्वारा लिखी गई कविता “कहां है मेरा हिंदुस्तान” आज पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. उनका जन्म सुल्तानपुर के हरखपुर गांव में हुआ था.
सुल्तानपुर के ग्राम बजैठी के रहने वाले जनरल बख्त खां का नाम ब्रिटिश काल में 1857 की क्रांति में महत्वपूर्ण योगदान के लिए लिया जाता है. दिल्ली के बादशाह ने उन्हें समय जनरल बख्त खां को अपनी सेवा का कमांडर इन चीफ नियुक्त किया था. 1856 और 57 में दिल्ली और आगरा के निकटवर्ती क्षेत्र में उन्होंने कई भयंकर युद्ध किए. ऐसे बहादुर सेनानी के वंशज आज भी सुल्तानपुर जिले के ग्राम बजैठी में मौजूद हैं.
सुल्तानपुर जिले का नाम राष्ट्रीय स्तर पर बनाने में बाबू गणपत सहाय का एक अहम योगदान माना जाता है. बंग-भंग की घटना के बाद वह विपिन चंद्र पाल के संपर्क में आए और कॉलेज की नौकरी का पारित कर दिया . उन्होंने अधिवक्ता के रूप में अपना सार्वजनिक जीवन प्रारंभ किया. लाल बाल पाल की अपनी राजनीति से हुए साल 1921 में जिला कांग्रेस कमेटी का उन्हें प्रथम अध्यक्ष चुना गया. देश के समस्त राष्ट्रीय नेताओं जैसे महात्मा गांधी मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरोजिनी नायडू, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस आदि से उनके व्यक्तिगत संबंध थे. वर्तमान में उनके नाम पर डिग्री कॉलेज संचालित है.
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पंडित श्रीपति मिश्र ग्राम सैदपुर जनपद सुलतानपुर के रहने वाले थे. इनका जन्म साल 1924 में हुआ. वह पैसे से अधिवक्ता न्यायिक अधिकारी और राजनेता थे. इन्होंने राजनेता के रूप में प्रदेश के डिप्टी स्पीकर, मंत्री और फिर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के पद पर अपनी सफलता का परचम लहराया और सुल्तानपुर का नाम रोशन किया. वे मछली शहर जौनपुर से सांसद भी निर्वाचित हुए. इसके साथ ही कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री एसोसिएशन की बैठक में भाग लेने के लिए वर्मा, लुसाका, जाम्बियाष, मॉरीशस और श्रीलंका की यात्राएं भी की. वर्तमान में सुल्तानपुर में उनकी स्मृति में उनके गृह बाजार सूरापुर में एक महाविद्यालय में खोला गया है.
मजरूह साहब का असली नाम असरार उल हसन खान था, लेकिन पूरी दुनिया इन्हें मजरूह सुल्तानपुरी के नाम से ही जानती है. ये मूलतः उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के एक छोटे से गांव गंजेहड़ी के रहने वाले थे. उन्होंने यूनानी मेडिसिन में पढ़ाई भी की, लेकिन शेरों शायरी में उनका ऐसा मन लगा कि उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र को त्याग दिया. शायद यही वजह रही, जो बॉलीवुड में फिल्म निर्माता ए आर कारदार ने उन्हें फिल्मों में गाना गाने का मौका दिया, जिसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. मजरूह सुल्तानपुरी ने करीब 350 फिल्मों में 2000 से अधिक गाने लिखे, जिसके चलते उन्हें 1993 में दादा साहब फाल्के का अवॉर्ड भी दिया गया. 24 मई 2000 को उनका मुंबई में निधन हो गया.
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