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इंटरनेशनल महिला दिवस के मौके पर जब हम सिनेमा की उन आवाजों को याद करते हैं जिन्होंने पर्दे पर महिलाओं की छवि को नई पहचान दी है, तो उनमें तापसी पन्नू का नाम खास तौर पर सामने आता है. तापसी उन अभिनेत्रियों में से हैं जिन्होंने हिंदी सिनेमा में लंबे समय से चले आ रहे ‘बेबस और सहने वाली नायिका’ के सांचे को चुनौती दी है. तापसी सिर्फ किरदार निभाने तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि अपने रोल्स के जरिए उन महिलाओं की कहानियां सामने लाती हैं जो अपनी पहचान, सम्मान और अधिकार के लिए आवाज उठाती हैं.
नई दिल्ली. तापसी पन्नू मौजूदा दौर में बॉलीवुड की उन एक्ट्रेसेस में शुमार हैं जिन्होंने पर्दे पर एक से बढ़कर एक सशक्त किरदार अदा किए हैं. उनके द्वारा चुनी गई फिल्में अक्सर समाज में मौजूद उन सवालों को उजागर करती हैं, जिन पर खुलकर बात करने की जरूरत होती है.
तापसी पन्नू का सिनेमा दरअसल उस नई सोच का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें महिला कैरेक्टर सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि कहानी की दिशा तय करने वाली ताकत बनकर सामने आते हैं. इंटरनेशनल वुमेन्स डे के मौके पर तापसी पन्नू की उन फिल्मों के बारे में बताते हैं जिन्होंने सिल्वर स्क्रीन पर औरतों को मजबूती से पेश किया.
पिंक: क्लाइमैक्स के ट्रायल में मीनल अरोड़ा (तापसी) से उसके ‘चरित्र’ पर सवाल किए जाते हैं. इस दृश्य की असली ताकत उसके थके हुए लेकिन दृढ़ स्वर में बोले गए शब्द ‘ना’ में है. यह सीन भारतीय पॉप कल्चर में ‘ना का मतलब ना’ के सिद्धांत को स्थापित कर देता है, जहां तापसी का कांपता लेकिन अडिग चेहरा समाज की पीड़िता को दोष देने वाली मानसिकता का आईना बन जाता है.
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बेबी: 15 मिनट के फिल्म के दमदार सीक्वेंस में तापसी का किरदार प्रिया नेपाल के एक होटल रूम में ए आतंकवादी को खत्म कर देती है. यह बॉलीवुड में महिला कलाकारों के लिए एक क्रांतिकारी क्षण था. जहां ग्लैमरस स्टंट्स की जगह असली, कच्ची और तकनीकी रूप से मजबूत हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट दिखाया गया.
थप्पड़: ‘सिर्फ एक थप्पड़’ का एहसास: इस फिल्म का सबसे प्रभावशाली पल थप्पड़ नहीं, बल्कि बाद में अमृता और उसकी सास के बीच हुई शांत बातचीत है. वह बताती है कि वह आगे क्यों नहीं बढ़ सकती. तापसी ने उस महिला के भावों को बेहद सटीकता से दिखाया है, जो यह महसूस करती है कि एक ‘छोटी’ घटना ने उसकी पूरी गरिमा और आत्मसम्मान को मिटा दिया.
सांड की आंख: फिल्म ‘सांड की आंख’ में तापसी पन्नू ने शूटर दादी प्रकाशी तोमर का किरदार निभाते हुए एक ऐसी महिला की भावनाओं को बखूबी उकेरा है, जो 60 साल की उम्र में अपनी छिपी हुई प्रतिभा को पहचानती है. तापसी ने उस मासूम उत्साह और आत्मविश्वास को बेहद संवेदनशील तरीके से पर्दे पर उतारा है, जो जीवन के इस नए मोड़ पर प्रकाशी तोमर महसूस करती हैं.
नाम शबाना: फिल्म ‘नाम शबान’ के अंतिम मिशन में तापसी पन्नू द्वारा निभाई गई शबाना का किरदार एक मरीज के भेष में दुश्मन के करीब पहुंचता है, जहां उसे एक हथियार तस्कर को खत्म करना होता है. इस पूरे दृश्य की असली ताकत तापसी के शांत, संतुलित और बेहद आत्मविश्वास भरे रवैये में दिखाई देती है.
अस्सी: रावी के किरदार में, जो इस केस की वकील है, तापसी पन्नू एक दमदार मोनोलॉग देती हैं जो न्याय व्यवस्था की विफलता और समाज की पाखंड भरी सोच को चुनौती देता है. अनुभव सिन्हा की फिल्म में तापसी दमदार रोल में नजर आई थीं.
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