‘सदा आनंद रहे एहि द्वारे’… बलिया में वसंत पंचमी से गूंजता है फगुआ, पूरा गांव बनता कलाकार, विदेश से भी लौट आते हैं लोग

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बलिया: जनपद के कई गांवों में आज भी होली की एक पारंपरिक विधा पूरी तरह से बरकरार है. जी हां यहां फगुआ गाने की परंपरा होली से एक महीना पहले यानी वसंत पंचमी से ही शुरू हो जाती है. लोग इसका स्पेशल में खुद के घर पर भी आयोजन करते हैं, जिसके लिए पूरे गांव को चलावा यानी निमंत्रण दिया जाता हैं. फिर क्या ढोल-मंजीरे और डफ आदि पारंपरिक वाद्ययंत्र के साथ पूरा गांव जुटता है और फगुआ की आवाज गूंजने लगती है.

आपको बताते चलें कि, होली से पहले शुरू हुआ यह फगुआ करीब एक हफ्ते बाद तक चलता रहता है. यह टोली हर घर जाती है, अबीर लेती है और फगुआ का गायन करती है. खास बात यह कि इस परंपरा में मुस्लिम भाई भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं. यहीं नहीं इसमें कोई बाहर से कलाकार नहीं आते, बल्कि पूरा गांव ही कलाकार बन जाता हैं. उसका कोई स्पेशल क्लास नहीं, बल्कि यह गुण पीढ़ी दर पीढ़ी खुद जेहन में उतर जाती हैं. आगे विस्तार से जानिए…

जन्म से ही इस परम्परा को देखते आ रहे
बलिया जनपद के नरही थाना क्षेत्र अंतर्गत चौरा गांव निवासी चन्द्रेश्वर सिंह ने कहा कि, आज सुनील सिंह के यहां फगुआ का आयोजन हुआ है, जो हर कहीं न कहीं होता है. उनकी उम्र 70 साल हो गई है, वह जन्म से ही इस परम्परा को देखते आ रहे हैं. यह सदियों से बाप दादा के द्वारा होता आ रहा है, जिसे आज भी बरकरार रखा गया है. इसमें बहुत दूर दूर से लोग आते है. यही नहीं सिर्फ होली के लिए जो नौकरी करने विदेश जाते हैं, वो लोग भी होली में फगुआ गाने के लिए गांव में आते हैं. ढोलक बजा रहे रोहित सिंह खुद छुट्टी लेकर होली में विदेश से चौरा अपने गांव आए हैं.

होली के फगुआ में पारंपरिक गीत
उन्होंने कहा कि, एक कहावत है कि उनके परिवार के एक पूर्वज नौकरी करते थे, किन्हीं परिस्थितियों में उनको वसंत पंचमी और खिचड़ी की छुट्टी नहीं मिली, तो होली में डफ बजाने के लिए नौकरी छोड़कर गांव आ गए. प्रेम प्रताप सिंह उर्फ छोटकु सिंह ने कहा कि, इस होली के फगुआ में पारंपरिक गीत जैसे रंगहोली, मनोरवा और नारदी आदि गाया जाता हैं. इसमें हिन्दू और मुस्लिम भी प्रतिभागी बनते हैं, कोई भेदभाव नहीं होता है. यह होली की धुन वसंत पंचमी से ही शुरू हो जाती है. राणा प्रताप सिंह ने कहा कि, यह एक बहुत ही सुकून भरा पल होता है. यह पर्सनल भी लोग अपने द्वार पर कराते हैं, उसके पहले पूरे गांव को आमंत्रित किया जाता हैं कि आज फलाने के घर होली है.

सदा आनंद रहे एहि द्वारे, मोहन खेले होली
इसमें जरूरत के हिसाब से गाली भी गाया जाता है. बुरा न मानो होली है. इस दौरान बुजुर्गों में भी जवानी आ जाती हैं. खासकर होली के दिन जहां सम्मत जलता है, वहां फगुआ गाया जाता है, उसके बाद दिनभर रंग खेला जाता है. ब्रह्माशंकर सिंह ने कहा कि, फिर शाम को नया कपड़ा पहनकर नाथ बाबा मंदिर पर पूरा गांव आता है. अब यहां फगुआ होने के बाद गांव के सभी घर पर फगुआ गाया जाता है, यथाशक्ति हर कोई अपने दरवाजे पर फफुआ टीम का स्वागत करता है, जो होली के लगभग सात दिनों तक चलता है. फगुआ की समाप्ति//सदा आनंद रहे एहि द्वारे, मोहन खेले होली// नामक गीत से होता है.

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