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ऑस्कर विनर स्क्रीनराइटर जेरेमी लार्नर का 88 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. 1972 की राजनीतिक ड्रामा फिल्म ‘द कैंडिडेट’ की पटकथा के लिए वह सबसे ज्यादा जाने जाते थे, जिसके लिए उन्हें एकाडेमी अवॉर्ड्स में बेस्ट ओरिजिनल स्क्रीनप्ले का अवॉर्ड मिला था. फिल्म में रॉबर्ट रेडफोर्ड ने मुख्य भूमिका निभाई थी.
स्क्रीनराइटर का निधन
नई दिल्ली. हॉलीवुड ने एक ऐसे लेखक और राजनीतिक कहानीकार को खो दिया है, जिसने सिनेमा में राजनीति को नई गहराई के साथ पेश किया. ऑस्कर विजेता स्क्रीन राइटर जेरेमी लार्नर का 88 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है. उनके बेटे जेसी लार्नर ने उनकी मौत की खबर की पुष्टि करते हुए बताया कि दिग्गज स्क्रीनराइटर ने 24 फरवरी को ही इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था. 24 फरवरी को कैलिफोर्निया के ओकलैंड स्थित एक नर्सिंग होम में बीमारी से एक लंबी जंग के बाद उनका निधन हो गया था.
जेरेमी लार्नर को सबसे ज्यादा पहचान 1972 की राजनीतिक ड्रामा फिल्म ‘द कैंडिडेट’ की कहानी लिखने के लिए मिली थी. इस फिल्म ने अमेरिकी राजनीति की अंदरूनी दुनिया को बेहद रियल तरीके से पर्दे पर उतारा था. उनकी इस शानदार पटकथा के लिए उन्हें 1973 में एकेडमी अवॉर्ड्स में बेस्ट ओरिजिनल स्क्रीनप्ले का पुरस्कार मिला था.
‘द कैंडिडेट’ के लिए जीता था ऑस्कर
फिल्म की कहानी एक आदर्शवादी वकील बिल मैके के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे अमेरिकी सीनेट का चुनाव लड़ने के लिए मनाया जाता है. फिल्म में इस किरदार को मशहूर अभिनेता रॉबर्ट रेडफोर्ड ने निभाया था. शुरुआत में उसे अपनी जीत की कोई उम्मीद नहीं होती, लेकिन चुनावी अभियान के दौरान हालात बदलते जाते हैं और वह आखिरकार जीत जाता है. फिल्म के अंत में उसका अपने कैंपेन मैनेजर से पूछा गया सवाल-‘अब हम क्या करें?’—राजनीतिक व्यवस्था पर गहरी टिप्पणी बनकर सामने आता है.
जेरेमी लार्नर की इस फिल्म की प्रेरणा उनके अपने राजनीतिक अनुभवों से आई थी. 1968 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान उन्होंने सीनेटर युगेने (Eugene McCarthy) के लिए स्पीच राइटर के रूप में काम किया था. चुनावी राजनीति के उसी अनुभव को उन्होंने फिल्म की कहानी में ढाल दिया. बाद में उन्होंने कहा था कि उन्हें इस फिल्म के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि वह उन गिने-चुने लोगों में थे जिन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के लिए भाषण भी लिखे थे और फिल्मों के लिए पटकथा भी.
जेरेमी लार्नर राजनीति और अभिनय के बीच दिलचस्प समानता भी देखते थे. उनका मानना था कि एक राजनेता किसी फिल्म स्टार की तरह होता है, जो खुद को एक ऐसे किरदार में ढाल लेता है जो वास्तविकता से थोड़ा बड़ा और प्रतीकात्मक बन जाता है. चुनावी अभियान के अनुभव को उन्होंने कभी एक नदी की यात्रा से तुलना करते हुए कहा था कि शुरुआत में सब कुछ रोमांचक लगता है, लेकिन धीरे-धीरे आगे आने वाले झरने की आवाज सुनाई देने लगती है और तब तक बहुत देर हो चुकी होती है.
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प्रांजुल सिंह 3.5 साल से न्यूज18 हिंदी से जुड़ी हुई हैं. उन्होंने Manorama School Of Communication (MASCOM) से जर्नलिज्म और मास कम्यूनिकेशन में डिप्लोमा किया है. वो 2.5 साल से एंटरटेनमेंट डेस्क पर काम कर रही है…और पढ़ें
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