1998 की वो फ्लॉप फिल्म, काजोल ने चीख-चीखकर हिला दिया था थिएटर, संजय दत्त का भी धरा रह गया था स्टारडम

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साल 1998 में रिलीज हुई एक ऐसी थ्रिलर फिल्म ने सिनेमाघरों में सन्नाटा और सिहरन दोनों भर दिए थे. कहानी बदले की आग, दर्द और डर के इर्द-गिर्द घूमती थी, लेकिन इसके बावजूद फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल नहीं कर सकी. जानते हैं किस फिल्म की बात कर रहे हैं?

नई दिल्ली. बॉलीवुड की दुनिया में कभी-कभी ऐसी फिल्में आती हैं, जो बॉक्स ऑफिस पर तो कमाल नहीं दिखा पातीं, लेकिन दर्शकों के जेहन में गहरी छाप छोड़ जाती हैं. साल 1998 में रिलीज हुई एक ऐसी ही फिल्म थी, जिसमें काजोल की चीखें थिएटर में गूंजती रहीं और लोगों को झकझोर कर रख दिया. इस फिल्म में संजय दत्त जैसे बड़े स्टार की मौजूदगी के बावजूद, वो कमर्शियल सक्सेस नहीं बन सकी. एक्ट्रेस की इंटेंस परफॉर्मेंस ने क्रिटिक्स और ऑडियंस को प्रभावित किया, लेकिन फिल्म का बजट और कलेक्शन का गणित कुछ और ही कहानी बयां करता है.

ये फिल्म उस दौर की है जब बॉलीवुड में थ्रिलर जॉनर धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रहा था, लेकिन दर्शकों की पसंद अभी भी रोमांटिक और एक्शन फिल्मों की तरफ ज्यादा झुकी हुई थी.<br />हम बात कर रहे हैं 1998 में रिलीज हुई फिल्म ‘दुश्मन’ की.

इस फिल्म का निर्देशन तनुजा चंद्रा ने किया था. फिल्म में काजोल और संजय दत्त के साथ आशुतोष राणा ने खलनायक के रूप में नजर आए थे. आशुतोष राणा ने विलेन के रूप में ऐसा प्रदर्शन दिया, जिसे आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे डरावने किरदारों में गिना जाता है.

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फिल्म की कहानी दो जुड़वा बहनों के इर्द-गिर्द घूमती है, जहां एक बहन की जिंदगी में एक खतरनाक दुश्मन घुस आता है. ये हॉलीवुड की ‘आई फॉर एन आई’ से इंस्पायर्ड बनाया था, लेकिन इसे भारतीय संदर्भ में ढाला गया है. काजोल ने फिल्म मे डबल रोल निभाया, एक मासूम और दूसरी बदला लेने वाली बहन. उनकी परफॉर्मेंस का हाईलाइट वो सीन था जहां चीख-चीख कर उन्होंने दर्द और गुस्से को पर्दे पर उतारा.

फिल्म देख थिएटर में बैठे दर्शक सिहर उठते थे. काजोल की आंखों में वो बदले की आग और चीखों की तीव्रता ने फिल्म को यादगार बना दिया. संजय दत्त ने एक आर्मी मैन का रोल प्ले किया, जो हीरोइन की मदद करता है, लेकिन उनका स्टारडम फिल्म को हिट बनाने में नाकाम रहा. आशुतोष राना ने विलेन के रूप में डेब्यू किया और उनका किरदार ‘गोकुल पंडित’ इतना डरावना था कि लोगों को रातों की नींद उड़ा दी. राणा की परफॉर्मेंस ने उन्हें फिल्मफेयर का बेस्ट विलेन अवॉर्ड दिलाया.

फिल्म का म्यूजिक उत्तम सिंह ने कंपोज किया, जिसमें ‘चिठ्ठी न कोई संदेश’ और ‘प्यार को हो जाने दो’ जैसे गाने शामिल थे, लेकिन वे चार्टबस्टर्स नहीं बन सके. शूटिंग मुख्य रूप से मुंबई और मनाली में हुई, जहां ठंडे मौसम ने थ्रिलर के माहौल को और बढ़ाया.

रिलीज के समय फिल्म को क्रिटिक्स से अच्छे रिव्यूज मिले ‘इंटेंस और इमोशनल’ बताया, तो किसी ने इसे काजोल की जमकर सराहना की. लेकिन दर्शकों का रिस्पॉन्स मिला-जुला रहा. दरअसल, उस दौर में ‘कुछ कुछ होता है’ और ‘घातक’ जैसी फिल्में हिट हो रही थीं, जिसके मुकाबले ये थ्रिलर पीछे रह गई.

‘दुश्मन’ का बजट करीब 4 करोड़ रुपये था, जो 1998 के हिसाब से ठीक-ठाक था. लेकिन बॉक्स ऑफिस पर ये उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी. इंडिया में नेट कलेक्शन 5.62 करोड़ रुपये रहा, जबकि ग्रॉस 9.56 करोड़. ओवरसीज में महज 1.45 लाख डॉलर यानी करीब 0.60 करोड़ की कमाई कर सकी, जिससे वर्ल्डवाइड ग्रॉस 10.16 करोड़ पहुंचा. बॉक्स ऑफिस इंडिया ने इसे ‘फ्लॉप’ का वर्डिक्ट दिया, क्योंकि बजट रिकवर नहीं हो सका और डिस्ट्रीब्यूटर्स को नुकसान हुआ.

संजय दत्त उस समय ‘खलनायक’ और ‘सड़क’ जैसी हिट्स से चमक रहे थे, लेकिन उनके स्टारडम का फायदा मेकर्स को नहीं मिला. काजोल की ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ की सक्सेस के बाद ये उनकी पहली थ्रिलर थी, लेकिन कमर्शियल फेलियर रही. हालांकि सालों बाद भी काजोल मानती हैं कि ये उनकी ‘सबसे डरावनी फिल्म’ है.

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