Career Growth vs Job Stability: 10 साल 1 ही जगह नौकरी करें या 10 कंपनियां बदलें? आज के दौर में कौन मार रहा है बाजी?

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नई दिल्ली (Career Growth vs Job Stability). राहुल पिछले 10 सालों से एक ही कंपनी में काम कर रहा है. वह भरोसेमंद है और उसे हर साल 5-8% का इंक्रीमेंट मिलता है. दूसरी तरफ समीर है, जिसने पिछले 10 सालों में 10 अलग-अलग स्टार्टअप्स और कंपनियों में काम किया. समीर ने ई-कॉमर्स, फिनटेक और एडुटेक जैसे अलग-अलग सेक्टर देखे हैं. राहुल के पास स्टेबिलिटी है तो समीर के पास अनुभवों का भंडार.. और शायद राहुल से दोगुनी सैलरी. आज का मार्केट इन दोनों को अलग-अलग नजरिए से देखता है.

बदलते वक्त के साथ करियर में भी कई बदलाव देखने को मिल रहे हैं. मौजूदा दौर में करियर के रास्ते पहले जैसे सीधे नहीं रहे हैं. आज की गिग इकोनॉमी और तेजी से बदलती टेक्नोलॉजी ने वर्कप्लेस की परिभाषा बदल दी है. अब सवाल यह नहीं है कि आप कितने समय तक टिकते हैं, बल्कि यह है कि आपने उस समय में क्या सीखा. जॉब हॉपिंग (बार-बार नौकरी बदलना) को पहले अस्थिरता का लक्षण माना जाता था, अब उसे स्मार्ट करियर ग्रोथ के रूप में देखा जा रहा है.

राहुल और समीर में से कौन सही?

ऊपर बताए गए 2 उदाहरणों में से आपको कौन सही लगा? जॉब वर्ल्ड में आए इस बदलाव के बीच एक बड़ी बहस छिड़ी है: क्या 10 साल तक एक ही कंपनी में वफादारी दिखाना बेहतर है या हर साल नई चुनौतियां चुनना? जानिए कैसे एंप्लॉयर्स अब केवल आपके कार्यकाल को नहीं, बल्कि अडैप्टेबिलिटी और स्किल सेट को भी तवज्जो दे रहे हैं. स्टेबिलिटी और मोबिलिटी के बीच का यह बैलेंस ही आज के प्रोफेशनल की सफलता का असली मंत्र बन गया है.

एक नौकरी में 10 साल: वफादारी का इनाम या ग्रोथ पर लगाम?

लंबे समय तक एक ही जगह टिके रहने का सबसे बड़ा फायदा ‘डोमेन अथॉरिटी’ है. राहुल अपनी कंपनी की रग-रग से वाकिफ है, वह ‘इंस्टीट्यूशनल एसेट’ बन चुका है. बड़ी कंपनियां ऐसे लोगों को पसंद करती हैं क्योंकि वे कल्चर को समझते हैं और संकट के समय स्टेबल रहते हैं. लेकिन इसका एक अलग पक्ष भी है. 10 साल एक ही जगह पर रहने से अक्सर Skill Stagnation (स्किल्स का रुक जाना) आ जाता है. आप बाहरी दुनिया की नई टेक्नीक्स और नेटवर्किंग से कट जाते हैं.

10 साल में 10 नौकरियां: जॉब हॉपिंग का रोमांच और रिस्क

समीर जैसे लोग (जो हर साल नई चुनौती चुनते हैं) अक्सर बहुत जल्दी नई चीजें सीखते हैं. उनका नेटवर्क बड़ा होता है और उनकी अडैप्टेबिलिटी कमाल की होती है. एंप्लॉयर्स अक्सर ऐसे लोगों को ‘गो-गेटर’ मानते हैं. हालांकि, हर साल नौकरी बदलना रेड फ्लैग भी हो सकता है. यह दिखाता है कि आप प्रेशर नहीं झेल सकते या आपमें धैर्य की कमी है. अगर समीर किसी ऐसी कंपनी में जाता है जहां लंबी प्लानिंग की जरूरत है तो वहां उसकी क्रेडिबिलिटी पर सवाल उठ सकते हैं.

क्या काम करता है आज?

आज के दौर में ‘गोल्डीलॉक्स अप्रोच’ (न बहुत कम, न बहुत ज्यादा) सबसे सही है. एक्सपर्ट मानते हैं कि 2 से 3 साल एक कंपनी में बिताना आदर्श है. यह आपको सीखने का समय देता है और ग्रोथ को रुकने भी नहीं देता. अगर आप राहुल की तरह वफादार हैं तो सुनिश्चित करें कि आप कंपनी के अंदर ही अपने रोल्स बदलते रहें.. और अगर आप समीर की तरह हैं तो सुनिश्चित करें कि आपके पीछे छोड़े गए काम की क्वॉलिटी ठोस हो, न कि सिर्फ रिज्यूमे पर कंपनियों की लिस्ट.

करियर की रेस में जीत Relevant रहने वाले की होती है. एंप्लॉयर यह नहीं देखते कि आप कितने समय तक अपनी कुर्सी से चिपके रहे, बल्कि यह देखते हैं कि आपने कंपनी की ग्रोथ में क्या वैल्यू जोड़ी.

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