खामेनेई की मौत के बाद बाराबंकी में उनके पैतृक गांव में सब दुखी, बोले– हमें फक्र है, उन्होंने अमेरिका के सामने सिर नहीं झुकाया

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ईरान के सबसे शक्तिशाली व्यक्तित्व अयातुल्लाह खामेनेई की जड़ें किंतूर गांव के ‘हिंदी’ परिवार से जुड़ी थीं। उनके दादा सैयद अहमद मुसावी हिंदी 19वीं सदी की शुरुआत तक इसी गांव में निवास करते थे और बाद में वह ईरान जाकर बस गए। अपनी भारतीय पहचान को जीवंत रखने के लिए उनके परिवार ने गर्व के साथ अपने नाम में ‘हिंदी’ उपनाम जोड़ा था

बाराबंकी: मिडिल ईस्ट में भड़की युद्ध की भीषण आग ने अब उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में भी शोक की लहर दौड़ा दी है. इजरायली सेना द्वारा किए गए विध्वंसक हवाई हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की खबर से वैश्विक राजनीति में भूचाल आ गया है. इस सनसनीखेज घटनाक्रम का सीधा असर बाराबंकी की सिरौली गौसपुर तहसील के किंतूर गांव में देखने को मिल रहा है.

गांव में पसरा सन्नाटा

खामेनेई का पैतृक जुड़ाव इसी गांव की मिट्टी से होने के कारण यहां सन्नाटा पसरा है. ग्रामीण अपने पुश्तैनी रक्त संबंध की इस दुखद घटना से स्तब्ध हैं क्योंकि इसी गांव की गलियों से निकलकर उनके पूर्वजों ने ईरान के सर्वोच्च सिंहासन तक का सफर तय किया था.

जानकारी के मुताबिक, ईरान के सबसे शक्तिशाली व्यक्तित्व अयातुल्लाह खामेनेई की जड़ें किंतूर गांव के ‘हिंदी’ परिवार से जुड़ी थीं. उनके दादा सैयद अहमद मुसावी हिंदी 19वीं सदी की शुरुआत तक इसी गांव में निवास करते थे और बाद में वह ईरान जाकर बस गए. अपनी भारतीय पहचान को जीवंत रखने के लिए उनके परिवार ने गर्व के साथ अपने नाम में ‘हिंदी’ उपनाम जोड़ा था. जैसे ही इजरायली बमबारी और मिसाइल हमले में खामेनेई के मारे जाने की सूचना सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के जरिए किंतूर पहुंची गांव के लोग गमगीन हो गए. किंतूर के बुजुर्ग आज भी उन दस्तावेजों और यादों को सहेजे हुए हैं, जो उन्हें ईरान के इस ताकतवर नेतृत्व से जोड़ती थीं.

ईरान में 40 दिनों के राजकीय शोक

इजरायल-ईरान के बीच छिड़े इस महायुद्ध ने न केवल दुनिया का नक्शा बदलने की आहट दी है, बल्कि किंतूर के उस गौरवशाली इतिहास के एक अध्याय का भी अंत कर दिया है. ईरान में घोषित 40 दिनों के राजकीय शोक के बीच बाराबंकी के इस छोटे से गांव की गलियों में भी मातम का माहौल है.

ग्रामीणों के लिए यह केवल एक विदेशी नेता की क्षति नहीं बल्कि उनके अपने गांव के एक महान वंशज की विदाई है जिसने सात समंदर पार जाकर मजहबी और सियासी दुनिया पर राज किया. संवेदनशीलता को देखते हुए लोग दबी जुबान में इस ऐतिहासिक नुकसान पर चर्चा कर रहे हैं, लेकिन उनकी आंखों में एक बड़े गौरवशाली स्तंभ के ढहने का दर्द साफ झलक रहा है.

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Vivek Kumar

विवेक कुमार एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वर्तमान में न्यूज 18 हिंदी के साथ जुड़े हैं और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लोकल खबरों पर नजर रहती है. इसके अलावा इन्हें देश-…और पढ़ें

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