विभाजन का दंश झेला, 1984 का दर्द सहा, करीब से देखी गरीबी, फिर भी बने इंडिया के टीवी मैन

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नई दिल्ली. भारत के कारोबारी इतिहास में कुछ कहानियां ऐसी हैं जो सिर्फ व्यापार की नहीं बल्कि जज्बे, संघर्ष और भरोसे की मिसाल बन जाती हैं. राजा सिंह ओबेरॉय की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. एक ऐसा बच्चा जिसने विभाजन के बाद सब कुछ खो दिया था, वही आगे चलकर भारत में टीवी को आम लोगों तक पहुंचाने वाला बड़ा नाम बन गया. इसीलिए उन्हें लंबे समय तक भारत का “टीवी मैन” कहा जाता रहा.

28 फरवरी 2026 को 90 साल की उम्र में उनके निधन के बाद एक बार फिर उनकी जिंदगी के किस्से चर्चा में हैं. जिस दौर में टीवी को अमीरों की चीज माना जाता था, उस समय उन्होंने किफायती टीवी सेट बनाकर इसे आम परिवारों के घर तक पहुंचाया. पंजाब और उत्तर भारत के लाखों लोगों के लिए टेक्सला टीवी सिर्फ एक इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट नहीं बल्कि उस दौर की याद बन गया.

विभाजन का दर्द और संघर्ष भरा बचपन

राजा सिंह ओबेरॉय का जन्म 19 फरवरी 1936 को अविभाजित भारत के मीरपुर में हुआ था, जो आज पाकिस्तान में है. 1947 में जब देश का विभाजन हुआ, तब वह सिर्फ 11 साल के थे. दंगों और हिंसा के माहौल में उनका परिवार सब कुछ छोड़कर भारत आ गया. दिल्ली पहुंचने के बाद परिवार को नए सिरे से जिंदगी शुरू करनी पड़ी. शुरुआती दिनों में राजा सिंह ने एक सब्जी विक्रेता के पास मजदूरी तक की. उनके पास कोई औपचारिक पढ़ाई नहीं थी, लेकिन काम सीखने और आगे बढ़ने की इच्छा बेहद मजबूत थी.

जुपिटर रेडियो से शुरू हुआ कारोबार

1961 में उन्होंने अपने कारोबारी सफर की पहली बड़ी शुरुआत की और जुपिटर रेडियो नाम से कंपनी बनाई. उस समय रेडियो और ट्रांजिस्टर तेजी से लोकप्रिय हो रहे थे, लेकिन अच्छी क्वालिटी के किफायती प्रोडक्ट कम मिलते थे. ओबेरॉय ने इसी मौके को पहचाना और सस्ते लेकिन भरोसेमंद रेडियो बनाना शुरू किया. धीरे धीरे उनके प्रोडक्ट बाजार में लोकप्रिय होते गए. एक समय ऐसा आया जब उनकी कंपनी हर साल करीब डेढ़ लाख से ज्यादा रेडियो सेट बेचने लगी.

टेक्सला टीवी का दौर

1972 में उन्होंने टेक्सला टीवी ब्रांड लॉन्च किया. शुरुआत छोटी थी और पहले साल केवल लगभग 2500 टीवी सेट बनाए गए. लेकिन बाजार की जरूरत को समझने की उनकी क्षमता ने धीरे धीरे इस ब्रांड को बड़ा बना दिया. 1980 के दशक के अंत तक टेक्सला पंजाब के टीवी बाजार का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा कंट्रोल कर रहा था. उस समय पंजाब के ज्यादातर घरों में टेक्सला टीवी दिखाई देता था. यही वह दौर था जब ओबेरॉय ने बेलटेक और बेस्टाविजन जैसे दूसरे ब्रांड भी शुरू किए.

कारोबार का असली पैमाना

अगर सिर्फ भावनाओं की जगह ठोस आंकड़ों की बात करें तो ओबेरॉय का बिजनेस उस दौर में काफी बड़े पैमाने पर पहुंच चुका था. 1980 के दशक के अंत तक टेक्सला का सालाना टर्नओवर 100 करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया था. आज के हिसाब से यह रकम लगभग 1500 से 2000 करोड़ रुपये के बराबर मानी जा सकती है.

1988 और 1989 के आसपास उनकी कंपनियां हर साल करीब 3 लाख टीवी सेट बना रही थीं. उस समय ब्लैक एंड व्हाइट टीवी की कीमत लगभग 2000 से 3500 रुपये के बीच होती थी, जबकि कलर टीवी 8000 से 12000 रुपये तक बिकते थे.

मुश्किल दौर में लोगों के साथ खड़े रहे

राजा सिंह ओबेरॉय सिर्फ कारोबारी ही नहीं थे बल्कि मानवीय सोच रखने वाले इंसान भी थे. 1984 के दंगों के बाद जब हजारों परिवारों की जिंदगी बिखर गई थी, तब उन्होंने कई पीड़ितों को अपने कारखानों में नौकरी देकर मदद की. विभाजन का दर्द झेलने के कारण वह जानते थे कि अचानक सब कुछ खो देने का मतलब क्या होता है. शायद इसी वजह से उन्होंने हमेशा जरूरतमंद लोगों की मदद करने की कोशिश की.

शिक्षा के क्षेत्र में भी बड़ा योगदान

राजा सिंह खुद ज्यादा पढ़ नहीं पाए थे, लेकिन उन्हें शिक्षा की अहमियत अच्छी तरह समझ में आती थी. इसी सोच के साथ उन्होंने देहरादून और लुधियाना में जीआरडी एकेडमी जैसे शिक्षण संस्थान शुरू किए. आज इन संस्थानों में हजारों छात्र पढ़ते हैं. इन स्कूलों और कॉलेजों की जमीन और परिसंपत्तियों की वैल्यू अब कई सौ करोड़ रुपये आंकी जाती है.

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