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Indian Citizenship: असम में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसके बारे में जानकर किसी भी दिल बैठ जाए. एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर की रिपोर्ट पर 24 महीने तक डिटेंशन कैंप में बिताने वाली एक महिला को भारतीय नागरिकता प्रदान की गई है. असम के फॉरेन ट्रिब्यूनल के आदेश पर उन्हें कैंप में भेजा गया था.
असम के कछार जिले के एक सब-इंस्पेक्टर की रिपोर्ट पर दिपाली दास को डिटेंशन कैंप में भेजने का आदेश दिया गया था. अब उन्हें भारतीय नागरिकता दी गई है. (सांकेतिक तस्वीर)
गुवाहाटी. असम के कछार जिले की 60 वर्षीय महिला दिपाली दास को लगभग सात साल बाद भारतीय नागरिकता मिल गई है. खास बात यह है कि जिस पुलिस रिपोर्ट के आधार पर उन्हें विदेशी घोषित कर डिटेंशन कैंप भेजा गया था, वही रिपोर्ट बाद में उनके लिए भारतीय नागरिकता का सबसे अहम सबूत बन गई. दिपाली दास को शुक्रवार को नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के तहत नागरिकता प्रमाणपत्र (नैचुरलाइजेशन सर्टिफिकेट) मिला. उनके वकील धर्मानंद देब ने बताया कि नागरिकता साबित करने के लिए जिस दस्तावेज का इस्तेमाल किया गया, वह असम पुलिस के एक सब-इंस्पेक्टर द्वारा तैयार की गई वही जांच रिपोर्ट थी, जिसके आधार पर उनके खिलाफ विदेशी होने का मामला दर्ज किया गया था.
दिपाली दास असम के कछार जिले के हवाइथांग क्षेत्र के एक गांव में अपने परिवार के साथ रहती हैं. उनके खिलाफ मामला तब शुरू हुआ जब असम पुलिस के एक सब-इंस्पेक्टर ने विदेशी न्यायाधिकरण (Foreigners’ Tribunal) को रिपोर्ट भेजकर उन्हें संदिग्ध विदेशी बताया. रिपोर्ट में कहा गया था कि वह 25 मार्च 1971 के बाद बांग्लादेश से असम आई थीं. यह तारीख असम में नागरिकता तय करने की महत्वपूर्ण सीमा मानी जाती है. इसके बाद कछार के फॉरनर्स ट्रिब्यूनल ने फरवरी 2019 में उन्हें विदेशी घोषित कर दिया. उनके बेटे आदित्य दास ने बताया कि उस दिन पुलिस उनके पिता की फास्ट-फूड दुकान पर आई और उनकी मां से कुछ कागजों पर हस्ताक्षर कराने की बात कही. लेकिन इसके बाद उन्हें सीधे सिलचर सेंट्रल जेल ले जाया गया, जहां वह दो साल से अधिक समय तक डिटेंशन में रहीं.
दो साल जेल और फिर जमानत
‘इंडियन एक्सप्रेस’की रिपोर्ट के अनुसार, बराक घाटी में नागरिकता से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता कमल चक्रवर्ती ने बताया कि उन्होंने परिवार की मदद करते हुए मई 2021 में उनकी जमानत करवाई. यह जमानत सुप्रीम कोर्ट के 2020 के उस सामान्य आदेश के आधार पर मिली, जिसमें कहा गया था कि जो विदेशी दो साल की डिटेंशन अवधि पूरी कर चुके हैं, उन्हें जमानत पर रिहा किया जा सकता है. जमानत मिलने के बाद भी दिपाली दास की परेशानियां खत्म नहीं हुईं. उनके बेटे के अनुसार, रिहाई के बाद उन्हें हर सप्ताह धोलाई पुलिस स्टेशन में हाजिरी लगानी पड़ती थी. आदित्य ने बताया कि उनके पिता की तबीयत भी लंबे समय से खराब है, इसलिए मां को घर और परिवार की देखभाल के साथ-साथ पुलिस स्टेशन जाने की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती थी. पिछले कई साल परिवार के लिए बेहद कठिन रहे और उन्हें अदालतों और पुलिस के चक्कर लगाने पड़े.
पुलिस रिपोर्ट ही बनी वरदान
वकील धर्मानंद देब ने बताया कि देपाली दास के मामले में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज वही जांच रिपोर्ट थी, जिसे सब-इंस्पेक्टर ने विदेशी न्यायाधिकरण को भेजा था. उस रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से बांग्लादेश के सिलहट जिले के परानी बनियाचुंग इलाके का एक पता दर्ज था और यह उल्लेख किया गया था कि दिपाली दास वहां से असम आई थीं. चूंकि यह एक आधिकारिक पुलिस दस्तावेज था, इसलिए इसे नागरिकता संशोधन अधिनियम के तहत आवश्यक प्रमाण के रूप में इस्तेमाल किया गया. देब के अनुसार, इसी आधार पर यह साबित किया गया कि देपाली दास फरवरी 1988 में धार्मिक उत्पीड़न के कारण भारत आई थीं. इसके बाद उन्हें सीएए के प्रावधानों के तहत नागरिकता प्रदान कर दी गई.
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बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…और पढ़ें
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