International Women’s Day Special: क्या ‘सुपरविमेन’ बनने की कोशिश महिलाओं को बीमार कर रही है? समझिए ‘परफेक्शन’ का जाल

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क्या ‘सुपरविमेन’ बनने की कोशिश महिलाओं को बना रहा बीमार? समझिए ‘परफेक्शन’ का ज

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International Women’s Day 2026 : हर साल 8 मार्च को हम महिलाओं की शक्ति और उनके बहुआयामी (Multitasking) होने का जश्न मनाते हैं. सोशल मीडिया पर ‘सुपरविमेन’ और ‘आयरन लेडी’ जैसे शब्दों की बाढ़ आ जाती है. लेकिन इस प्रशंसा के पीछे एक डरावना सच भी छिपा है और वो है हर भूमिका में परफेक्ट दिखने का सामाजिक दबाव. आज की महिला ऑफिस, घर और रिश्तों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में खुद को पूरी तरह थका चुकी है.

Dark Side Of Being Superwoman : आज के समय में महिलाओं की भूमिका बहुत बदल गई है. वह ऑफिस की मीटिंग्स भी देख रही हैं, बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी भी उठा रही हैं और घर के छोटे-बड़े कामों को भी बखूबी संभाल रही हैं. हर महिला चाहती है कि वह हर काम को ‘परफेक्ट’ तरीके से करे. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हर काम में ‘नंबर वन’ दिखने के चक्कर में हम अपनी सेहत के साथ कितनी बड़ी खिलवाड़ कर रहे हैं?

समाज ने एक ‘आदर्श महिला’ की ऐसी छवि बना दी है जो कभी थकती नहीं, जिसे गुस्सा नहीं आता और जो हर काम चुटकी बजाते ही ‘परफेक्ट’ कर लेती है. जब महिलाएँ इस छवि को जीने की कोशिश करती हैं, तो वे ‘सुपरविमेन सिंड्रोम’ का शिकार हो जाती हैं. यह सिंड्रोम उन्हें यह महसूस कराता है कि अगर उन्होंने किसी काम में मदद माँगी या आराम किया, तो वे असफल मानी जाएंगी.

विशेषज्ञों की मानें तो ‘परफेक्ट’ दिखने की यह होड़ महिलाओं को मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार कर रही है. हर समय ‘अलर्ट मोड’ पर रहने से दिमाग में शांति नहीं रहती, जिससे बर्नआउट (Burnout) और एंग्जायटी की समस्या बढ़ रही है. इसके अलावा, नींद की कमी और लगातार तनाव शरीर में हार्मोनल असंतुलन पैदा करता है, जो आगे चलकर थायराइड और पीसीओएस (PCOS) जैसी बीमारियों का कारण बनता है.

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परफेक्शन सिर्फ एक भ्रम है- हमें यह समझना होगा कि दुनिया में कोई भी इंसान ‘परफेक्ट’ नहीं होता. मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि हर काम को बेहतरीन तरीके से करने की जिद हमें तनाव के सिवा कुछ नहीं देती. अपनी सीमाओं को पहचानना कोई कमजोरी नहीं है. यह स्वीकार करना कि आप एक इंसान हैं और आपसे भी गलतियाँ हो सकती हैं या आप भी थक सकती हैं, मानसिक शांति के लिए बहुत जरूरी है.

‘ना’ कहना भी जरूरी है- अक्सर महिलाएँ दूसरों को खुश करने के चक्कर में ‘ना’ नहीं कह पातीं. लेकिन अपनी सेहत और सुकून के लिए सीमाएं तय करना (Setting Boundaries) बहुत जरूरी है. अगर आप थकी हुई हैं, तो अतिरिक्त जिम्मेदारी लेने से मना करना सीखें. याद रखें, ‘ना’ कहना आपको एक बुरी महिला या कमज़ोर कर्मचारी नहीं बनाता, बल्कि यह आपकी समझदारी को दर्शाता है.

जिम्मेदारी बांटना कमजोरी नहीं- घर और बच्चों की जिम्मेदारी सिर्फ महिला की नहीं, बल्कि पूरे परिवार की है. इस महिला दिवस पर परिवार के अन्य सदस्यों को भी शामिल करें. घर के कामों में हाथ बंटाना या मदद मांगना आपकी हार नहीं है. जब जिम्मेदारियां बंटती हैं, तभी आपको वह ‘मी-टाइम’ मिल पाता है जिसमें आप अपनी हॉबीज और अपनी सेहत पर ध्यान दे सकती हैं.

सुपरविमेन नहीं, ‘हैप्पी विमेन’ बनें- इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर चलिए एक नया संकल्प लेते हैं. हमें ‘सुपरविमेन’ के उस भारी टैग की जरूरत नहीं है जो हमें बीमार कर दे. हमें जरूरत है एक ऐसी जीवनशैली की जहाँ हम स्वस्थ हों, खुश हों और खुद से प्यार करें. समाज को थकी हुई सुपरविमेन की नहीं, बल्कि एक मुस्कुराती और स्वस्थ महिला की जरूरत है.

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