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नई दिल्ली (Social Media Influence on Career Choices). आज के डिजिटल युग में हमारी सुबह अखबार की सुर्खियों से नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के ‘नोटिफिकेशन’ से होती है. इंस्टाग्राम की रील हो या लिंक्डइन का पोस्ट, हर जगह कोई न कोई अपनी सफलता का जश्न मना रहा है. कोई 22 साल की उम्र में करोड़पति बन रहा है तो कोई शानदार वर्क-लाइफ की तस्वीरें शेयर कर रहा है. लेकिन इस चकाचौंध के पीछे साइकोलॉजी का ऐसा दलदल है, जिसमें आज की पीढ़ी अनजाने में ही धंसती जा रही है. जब हम दूसरों की फिल्टर्ड कामयाबी देखते हैं तो अनजाने में ही अपनी तुलना उनसे करने लगते हैं.
तुलना का अंतहीन जाल
सोशल मीडिया पर हम दूसरों की हाईलाइट रील्स देखते हैं और उसकी तुलना अपने ‘बिहाइंड द सीन्स’ से करते हैं. जब ऑफिस में काम करने वाला कोई शख्स या क्लास में साथ पढ़ाई करने वाला दोस्त प्रमोशन या विदेश यात्रा की फोटो डालता है तो हमारा दिमाग तुरंत उसे सफलता का पैमाना मान लेता है. इस तुलना के दबाव में हम जल्दबाजी में ऐसे फैसले लेते हैं जो हमारे लॉन्ग-टर्म करियर गोल से मेल नहीं खाते. हम अपनी प्रोग्रेस को दूसरों की स्पीड से नापने लगते हैं, जो करियर के लिए बहुत रिस्की साबित हो सकता है.
सफलता का ‘ग्लैमराइजेशन’ और हकीकत
इन दिनों हर दूसरा वीडियो ‘साइड हसल’ या ‘पैसिव इनकम’ के बारे में होता है. सोशल मीडिया सफलता के केवल फाइनल रिजल्ट दिखाता है, उसके पीछे की सालों की मेहनत, अनिश्चितता और असफलता को छिपा लेता है. इसे देखकर युवाओं को लगता है कि सफलता रातों-रात मिल सकती है. इस चक्कर में वे अपना स्टेबल करियर छोड़कर रिस्क भरे लोकप्रिय रास्तों पर चल पड़ते हैं. जब हकीकत सामने आती है तो हताशा और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है.
भीड़ का हिस्सा बनने की मजबूरी
क्या आपने गौर किया है कि अचानक से हर कोई डेटा साइंटिस्ट, कोडिंग एक्सपर्ट, कॉन्टेंट क्रिएटर या डिजिटल मार्केटर बनना चाहता है? ऐसा इसलिए नहीं कि सबका जुनून एक है, बल्कि इसलिए क्योंकि सोशल मीडिया पर इन्हीं सेक्टर्स को ‘सक्सेसफुल’ दिखाया जा रहा है. इसे ‘सोशल प्रूफिंग’ कहते हैं, जहां हम अपनी पसंद छोड़कर उस रास्ते पर चल देते हैं जहां भीड़ ज्यादा है. इससे मार्केट में सैचुरेशन बढ़ता है और व्यक्ति की मौलिकता खत्म हो जाती है.
निर्णय लेने की क्षमता पर असर
सोशल मीडिया पर सूचनाओं की भरमार है. हर इन्फ्लुएंसर के पास करियर की अलग सलाह है, भले ही वो उसका एक्सपर्ट न हो. कई बार युवा इसी ‘इंफॉर्मेशन ओवरलोड’ के कारण भ्रमित हो जाते हैं. हम अपनी सहज बुद्धि (Intuition) पर भरोसा करने के बजाय बाहरी राय पर ज्यादा निर्भर हो जाते हैं. निर्णय लेने की यह प्रक्रिया जब दूसरों के हाथ में चली जाती है तो करियर में असंतोष की नींव पड़ती है. फिर इंसान खुद करियर में कितना भी अच्छा क्यों न कर रहा हो, उसे सैटिस्फैक्शन नहीं मिलता.
आभासी दुनिया के भ्रमजाल से कैसे बचें?
मौजूदा दौर में करियर और जिंदगी से जुड़े सही फैसले लेने के लिए डिजिटल भ्रमजाल से बचना जरूरी है. जानिए आप खुद को इससे सेफ कैसे रख सकते हैं:
- डिजिटल डिटॉक्स: करियर से जुड़े बड़े फैसले लेने से पहले सोशल मीडिया से दूरी बनाएं.
- सेल्फ असेसमेंट: अपनी ताकत और कमजोरियां पहचानें. पूछें कि क्या यह करियर मुझे पसंद है या मैं इसे सिर्फ इसलिए चुन रहा हूं क्योंकि यह ‘कूल’ दिखता है.
- मेंटरशिप: रैंडम वीडियो के बजाय उस क्षेत्र के असली एक्सपर्ट से बात करें.
- प्रक्रिया पर ध्यान दें: रिजल्ट के बजाय काम की प्रक्रिया (Work Process) से प्यार करना सीखें.
अपना रास्ता खुद बनाएं
आपका करियर आपकी अपनी यात्रा है, न कि किसी और की रील का रीमेक. सोशल मीडिया मोटिवेशन या इंस्पिरेशन का सोर्स तो हो सकता है, लेकिन यह आपके फैसलों का आधार नहीं होना चाहिए. याद रखें, हर चमकती चीज सोना नहीं होती और हर वायरल होने वाला करियर आपके लिए सही नहीं होता. अपनी काबिलियत पर भरोसा रखें और डिजिटल शोर के बीच अपनी उस आवाज को सुनें जो आपको वास्तव में खुश करती है. सफलता तभी स्थाई होती है जब वह आपकी अपनी शर्तों पर मिले.
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