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Success Story: आज के दौर में लगभग हर माता-पिता एक ही सवाल से जूझ रहे हैं कि बच्चों को कितना स्क्रीन टाइम देना सही है? मोबाइल, टैब और टीवी, अब बच्चों को शांत रखने का आसान तरीका बन गया है, लेकिन ज्यादातर पैरेंट्स यह मानते हैं कि यह सही समाधान नहीं है. कुछ ऐसा ही महसूस किया सुकृति और रजत मेंदिरत्ता ने भी. दोनों वर्किंग माता-पिता होकर चाहते थे कि उनका बेटा भी वही भारतीय संस्कार और संस्कृति महसूस करे, जो उन्होंने अपने बचपन में सीखी थी. कहानियों, मंत्रों, भजनों और परिवार के साथ पल बिताए. लेकिन जब उन्होंने मार्केट में ऑप्शन ढूंढे, तो उन्हें निराशा हाथ लगी. स्कूलों में संस्कृति से जुड़ाव सीमित था. मोबाइल ऐप्स बच्चों को और ज़्यादा स्क्रीन से जोड़ रहे थे. ज्यादातर खिलौने सिर्फ मनोरंजन या तेज़ आवाज़ और लाइट्स पर आधारित थे. उनमें इमोशनल जुड़ाव या भारतीय पहचान की कमी थी. तब उनके मन में एक सवाल आया कि क्या बच्चों को भारतीय संस्कृति से जोड़ने का कोई शांत, आसान और स्क्रीन-फ्री तरीका नहीं हो सकता?
यहीं से शुरू हुई Panda’s Box की. अप्रैल 2022 में इस विचार को हकीकत का रूप मिला. इस सोच के पीछे सुकृति का एक निजी अनुभव था. एक मां के तौर पर वह अपने बेटे के लिए ऐसे तरीके ढूंढ रही थीं, जिससे वह भारतीय कहानियों, मंत्रों और वैल्यूज़ से जुड़ सके, लेकिन बिना मोबाइल के. सुकृति का कॉर्पोरेट करियर काफी सफल रहा था. उन्होंने कई बड़ी कंपनियों में ब्रांड और मार्केटिंग की जिम्मेदारी संभाली थी. लेकिन उन्हें लगा कि बच्चों के लिए सोच-समझकर बनाए गए सांस्कृतिक लर्निंग प्रोडक्ट्स की बाजार में कमी है. यही कमी उन्हें बिजनेस की ओर ले गई.
Panda Box को पति-पत्नी ने मिलकर संभाला
सुकृति के पास ब्रांड और मार्केटिंग का 15 साल से ज्यादा का अनुभव है. उन्होंने Hyundai, Revlon, Sugar Free (Zydus Wellness) और Cosmo First जैसी कंपनियों में काम किया. Panda’s Box में वह प्रोडक्ट डिजाइन और ब्रांड की दिशा तय करती हैं. उनका फोकस भारतीय परंपरा को आज के मॉडर्न पैरेंट्स की जरूरतों से जोड़ना रहा है.
इस सफर में उनके साथ बराबरी से जुड़े रजत मेंदिरत्ता. रजत को ऑपरेशंस और बिजनेस बढ़ाने का लंबा अनुभव है. वह पहले Modi Naturals Limited में COO रह चुके हैं और अलग-अलग सेक्टर में काम कर चुके हैं. Panda’s Box में वह मैन्युफैक्चरिंग, सप्लाई चेन और बिजनेस ऑपरेशंस संभालते हैं. यानी सुकृति जहां आइडिया और ब्रांड पर ध्यान देती हैं, वहीं रजत उसे ज़मीन पर उतारने का काम करते हैं.
शुरुआत में आई परेशानी
लेकिन शुरुआत आसान नहीं थी. भारतीय सॉफ्ट टॉय इंडस्ट्री काफी बिखरी हुई है. छोटे कारीगर बड़े ऑर्डर संभाल नहीं पाते और बड़े निर्माता छोटे ऑर्डर लेने में दिलचस्पी नहीं दिखाते. सिर्फ कुछ सौ यूनिट बनवाना भी बड़ी चुनौती बन गया. करीब छह महीने तक उन्हें कई बार मना किया गया. कई ट्रायल हुए, कई दरवाज़े खटखटाए गए. आखिरकार एक ऐसा वेंडर मिला, जो उनके साथ यह नया प्रयोग करने को तैयार हुआ. जो प्रोडक्ट वे बना रहे थे, वह भी नया था- मंत्र बोलने वाले प्लश टॉय. भारतीय बाजार में ऐसा कुछ पहले नहीं था. मन में डर था कि क्या माता-पिता इसे समझ पाएंगे? क्या बच्चे इससे जुड़ पाएंगे? लेकिन जब पहले प्रोडक्ट घरों तक पहुंचे, तो प्रतिक्रिया उम्मीद से बेहतर रही.
Panda’s Box को कब मिली पहचान?
बच्चे इन खास खिलौनों की ओर खुद-ब-खुद आकर्षित हुए. माता-पिता ने महसूस किया कि हल्की, शांत ध्वनियां और सरल डिजाइन बच्चों को सुकून देते हैं. बिना किसी ज़बरदस्ती के, ये खिलौने बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बनने लगे. जैसे बच्चे सोने से पहले इन खिलौनों से मंत्र सुनते या कहानी सुनते-सुनते सो जाते. यहीं से Panda’s Box ने धीरे-धीरे आगे बढ़ना शुरू किया. ब्रांड ने जल्दबाजी में विस्तार नहीं किया. माता-पिता के फीडबैक को ध्यान से सुना गया. इसके बाद जो सुझाव मिले, उन्हें अगली प्रोडक्ट लाइन में शामिल किया गया. धीरे-धीरे प्लश टॉय के साथ म्यूजिकल बुक्स, स्टोरीटेलिंग कम्पैनियन और सांस्कृतिक प्ले किट्स भी लॉन्च किए गए. इन सभी का मकसद एक ही था बच्चों को स्क्रीन से दूर रखते हुए, उन्हें भारतीय संस्कृति से जोड़ना. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और क्विक-कॉमर्स ऐप्स के जरिए यह ब्रांड देशभर में पहुंचा. Amazon के साथ जुड़ने से इसकी पहुंच और बढ़ी. आज हजारों परिवार इन प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं.
कंपनी को शार्क टैंक से मिली पहचान
अब तक दो लाख से ज्यादा बच्चे Panda’s Box से जुड़ चुके हैं. कंपनी की मासिक कमाई भी लगातार बढ़ रही है, जो इस बात का संकेत है कि माता-पिता को यह आइडिया पसंद आ रहा है. एक बड़ा मोड़ तब आया, जब Panda’s Box को Shark Tank India में मौका मिला. इस मंच ने ब्रांड को राष्ट्रीय पहचान दिलाई. लेकिन सुकृति और रजत के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि सिर्फ टीवी पर आना नहीं था. उनके लिए असली जीत यह थी कि उनका छोटा-सा आइडिया हजारों घरों तक पहुंच चुका था. आज जब हर घर में स्क्रीन का दखल बढ़ता जा रहा है, ऐसे में Panda’s Box जैसे प्रयास यह याद दिलाते हैं कि बच्चों को संस्कृति सिखाने के लिए बड़े-बड़े लेक्चर की जरूरत नहीं होती. कभी-कभी एक खिलौना, एक मीठी आवाज़ और एक छोटी-सी कहानी ही काफी होती है.
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