Why do clocks move clockwise | घड़ी की सुई हमेशा दाईं (Right) तरफ ही क्यों घूमती है? इसके पीछे छिपा है सदियों पुराना राज

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Why do clocks move clockwise : बचपन से ही हम ‘Clockwise’ यानी घड़ी की सुई की दिशा में काम करना सीखते आए हैं. चाहे स्कूल की रेस हो या मंदिर की परिक्रमा, हम हमेशा दाईं तरफ से ही घूमते हैं. लेकिन क्या आपने कभी ठहरकर यह सोचा है कि घड़ी की सुइयां हमेशा दाईं तरफ ही क्यों चलती हैं? वे बाईं तरफ यानी ‘Anti-clockwise’ क्यों नहीं घूमतीं? इस छोटी सी दिखने वाली बात के पीछे हजारों साल पुराना इतिहास और खगोल विज्ञान का एक बहुत बड़ा कारण छिपा है. आइए जानते हैं.

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में समय बहुत जरूरी है. चाहे हमें ऑफिस जाना हो, ट्रेन पकड़नी हो या किसी से मिलना हो, हमारी नजरें हमेशा घड़ी पर ही रहती हैं. ऐसे में आपने कभी सोचा है कि दीवार पर टंगी घड़ी या हाथ में पहनी घड़ी की सुई हमेशा बाईं से दाईं तरफ ही क्यों घूमती है? ये कोई संयोग नहीं है, इसके पीछे इतिहास और भूगोल से जुड़ी वजह है.

चाहे दीवार घड़ी हो, कलाई घड़ी हो या फिर किसी टावर की बड़ी घड़ी — समय हमेशा एक ही दिशा में आगे बढ़ता दिखाई देता है. लेकिन क्या यह सिर्फ एक संयोग है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक और ऐतिहासिक कारण छिपा है? दरअसल, घड़ी की सुई के दाईं ओर घूमने के पीछे सदियों पुरानी परंपरा और खगोल विज्ञान से जुड़ा एक बड़ा कारण है, जिसे जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे. 

घड़ी की सुई किस दिशा में घूमती है, इसे समझने के लिए हमें सैकड़ों साल पीछे जाना होगा. जब मशीन वाली घड़ियां नहीं बनी थीं, तब लोग समय जानने के लिए सूर्यघड़ी का इस्तेमाल करते थे. सूर्यघड़ी एक ऐसा यंत्र था, जो सूरज की रोशनी और उससे बनने वाली छाया के आधार पर समय बताता था. जैसे-जैसे सूरज आकाश में पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ता था, छाया भी एक निश्चित दिशा में घूमती थी. उत्तरी गोलार्ध में यह छाया दाईं ओर खिसकती थी. बाद में जब यांत्रिक घड़ियां बनीं, तो उनकी सुइयों की दिशा भी उसी छाया की गति के अनुसार तय की गई.

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इसी कारण सूर्यघड़ी में छाया बाईं से दाईं ओर सरकती दिखाई देती थी. जमीन पर एक जगह खड़ी लकड़ी या डंडे की छाया को देखकर लोग समय का अनुमान लगाना सीख गए थे. जैसे-जैसे सूरज आकाश में आगे बढ़ता, वैसे-वैसे छाया भी धीरे-धीरे एक निश्चित दिशा में घूमती रहती थी. लोग छाया की लंबाई और दिशा देखकर सुबह, दोपहर और शाम का पता लगा लेते थे. खास बात यह है कि यह छाया उसी दिशा में घूमती थी, जिस दिशा में आज घड़ी की सुइयां घूमती हैं. बाद में जब यांत्रिक घड़ियां बनीं, तो उनकी सुइयों की चाल भी उसी प्राकृतिक गति के अनुसार तय की गई.

12वीं और 15वीं सदी के बीच यूरोप में जब पहली बार मशीन से चलने वाली घड़ियां बनाई गईं, तब इंजीनियरों और आविष्कारकों के सामने एक बड़ा सवाल था. घड़ी की सुइयां किस दिशा में घूमें? उस समय लोग कई सदियों से सन डायल यानी सूर्य घड़ी का इस्तेमाल कर रहे थे. लोगों की आदतों और प्राकृतिक परंपराओं को ध्यान में रखते हुए, मशीन वाली घड़ियों की सुइयां भी सूरज की छाया की दिशा में ही बनाई गईं.

यूनानी खोजों के प्रभाव और पुराने रीति-रिवाजों की वजह से, घड़ी की सुइयों की दिशा सूरज की घड़ी की छाया की दिशा की तरह ही रखी गई थी. पुराने रीति-रिवाजों को याद रखने और सूरज की छाया का पालन करने के लिए ही घड़ी की सुइयां दाईं तरफ घूमती हैं.

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