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कृषि वैज्ञानिक डॉ. रामपाल ने बताया कि जिन खेतों में किसान नीलगाय के डर से खेती नहीं करते, वहां तिल की खेती एक अच्छा विकल्प है. तिल की फसल के लिए ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती है. यदि बुवाई के समय खेत में नमी हो या हल्की सिंचाई की व्यवस्था हो जाए तो उसके बाद अधिक पानी की जरूरत नहीं पड़ती
देखिए प्रदेश में किसान नीलगाय की बढ़ती समस्या से परेशान अक्सर दिखते हैं. कई बार सरसों, आलू और मकई की फसल के बाद खेतों को खाली छोड़ देते हैं. खासकर चौर और टाल इलाके में किसानों को यह डर रहता है कि अगर दूसरी फसल लगाई गई तो नीलगाय उसे नुकसान पहुंचा सकती है. ऐसे में अब कृषि वैज्ञानिक किसानों को खाली खेतों में तिल की खेती करने की सलाह दे रहे हैं, जिससे किसानों को अतिरिक्त आमदनी भी हो सकती है और खेत भी खाली नहीं रहेगा. यह एग्री टिप्स खासकर बेगूसराय, खगड़िया, मुंगेर, लखीसराय, नवादा , शेखपुरा आदि जिले के किसानों के लिए लाभकारी जानकारी हो सकती है.
कम पानी में हो सकती है तिल की खेती
कृषि विज्ञान केंद्र खोदावंदपुर के प्रधान कृषि वैज्ञानिक डॉ. रामपाल ने बताया कि जिन खेतों में किसान नीलगाय के डर से खेती नहीं करते, वहां तिल की खेती एक अच्छा विकल्प है. तिल की फसल के लिए ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती है. यदि बुवाई के समय खेत में नमी हो या हल्की सिंचाई की व्यवस्था हो जाए तो उसके बाद अधिक पानी की जरूरत नहीं पड़ती. यही वजह है कि कम पानी वाले क्षेत्रों में भी इसकी खेती आसानी से की जा सकती है.
नीलगाय नहीं करती तिल की फसल को नुकसान
लोकल 18 पर कृषि वैज्ञानिक डॉ. रामपाल ने बताया कि तिल की फसल को नीलगाय आमतौर पर नुकसान नहीं पहुंचाती है. यही कारण है कि जिन क्षेत्रों में नीलगाय का ज्यादा प्रकोप है वहां भी किसान तिल की खेती कर सकते हैं. उन्होंने बताया कि किसान मूंग की खेती भी करते हैं, जिससे अच्छी आमदनी होती है, लेकिन मूंग की फसल तोड़ने में मजदूरों की जरूरत ज्यादा पड़ती है. आजकल मजदूरों की कमी भी किसानों के लिए बड़ी समस्या बन रही है, जिसके कारण कई बार फसल खेत में ही रह जाती है.
बुवाई के समय रखें नमी का ध्यान
लोकल 18 पर दिए गए कृषि वैज्ञानिक की जानकारी के अनुसार ने तिल की खेती में किसानों को सबसे ज्यादा ध्यान बुवाई के समय खेत में नमी बनाए रखने पर देना चाहिए. यदि बीच में सिंचाई की जाती है तो नीलगाय फिर से खेतों की ओर आ सकती है. इसलिए कोशिश करें कि बुवाई के समय ही पर्याप्त नमी हो, ताकि बाद में सिंचाई की जरूरत कम पड़े. इससे फसल भी अच्छी होगी और नीलगाय से नुकसान की आशंका भी कम रहेगी.
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