जंगल की बेटियां बनीं हुनर की पहचान! घास और मोर पंख से गहने बनाकर कमा रहीं पैसा

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जंगल की बेटियां बनीं हुनर की पहचान! घास और मोर पंख से गहने बनाकर कमा रहीं पैसा

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Baiga tribal women success story : आज हम आपको ऐसी आदिवासी बेटियों की कहानी बताने जा रहे हैं जो कभी जंगल-पहाड़ को ही अपनी दुनिया मानती थीं लेकिन मप्र सरकार ने इनके हुनर को पहचाना और आज ये बेटियां बड़े शहरों में जाकर आदिवासी समुदाय की परंपरा का प्रचार-प्रसार कर रही हैं. साथ ही इससे उन्हें कमाई भी होती है. आइए जानते हैं इन बेटियों की कहानी 

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Baiga Woman Success Story. आज हम आपको ऐसी आदिवासी बेटियों की कहानी बताने जा रहे हैं जो कभी जंगल-पहाड़ को ही अपनी दुनिया मानती थीं लेकिन मप्र सरकार ने इनके हुनर को पहचाना और आज ये बेटियां भोपाल इंदौर खजुराहो और रायपुर में जाकर आदिवासी समुदाय की पुरानी परंपरा का प्रचार-प्रसार भी करती है साथ ही इससे पैसों की कमाई भी करते हैं.

अनीता नरोतिया लोकल 18 से बातचीत में बताती हैं कि हम सभी ग्रुप में ही जाते हैं. हम सभी डिंडोरी जिले से आती हैं. हम बचपन से आदिवासी समुदाय की वेशभूषा में जो श्रंगार वाला सामान होता है. वह हम बचपन से ही बना रहे हैं. ये हुनर हमने बचपन से ही सीख लिया था. अनीता बताती हैं कि आदिवासी जब नृत्य करते हैं तो पूरा श्रंगार किया जाता है. इस श्रंगार में वीरन माला, फेटा, हिंदी और विभिन्न तरह की माला भी पहनी जाती हैं.

क्या है वीरन माला?
अनीता बताती हैं कि वीरन माला जो होती है वह महत्वपूर्ण श्रंगार की गिनती में आता है. इसे हम हांथ से ही तैयार करते हैं. ये वीरन माला घास से ही बनाई जाती है. इसलिए ये माला भी खास होती है.

ये है फेटा श्रंगार 
अनीता बताती हैं कि वीरन माला के साथ ही एक फेटा नाम का श्रंगार किया जाता है. फेटा जिसे पुरुष ही अपने सिर में पहनते हैं. इसे लड़कियां नहीं पहनती हैं. ये फेटा मयूर यानि मोर के पंखों से बनाई जाती है.

अनीता बताती हैं कि हिंदी नाम का श्रंगार भी होता है जिसे गले में पहना जाता है. इसे पुरुष और महिला दोनों ही पहनते हैं. कहने का मतलब है कि लड़का और लड़की दोनों ही इसे पहनकर त्योहार के दौरान साथ में नृत्य करते हैं. अनीता बताती हैं कि इसके अलावा एक और माला होती है जो धागे और दानों से बनती है.साथ ही मोर पंख को नए डिजाइन में बनाकर भी बेच रहे हैं.

हम सभी चारों डिंडोरी जिले के एक छोटे से गांव से आते हैं जहां ज्यादातर जंगल है. हमनें शहर नहीं घूमा है लेकिन सरकार जब कोई कार्यक्रम करवाती है तो हमें बुलाया जाता है. हम सभी बहनें बैगा जनजाति से आते हैं. अभी यहां

About the Author

Amit Singh

7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह…और पढ़ें

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