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ईरान के साथ छिड़ी जंग और आसमान छूती तेल की कीमतों के बीच ट्रंप प्रशासन ने एक ऐसा फैसला लिया है, जिसने पूरी दुनिया के कूटनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है. अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने पर लगे प्रतिबंधों में भारत को बड़ी ढील दे दी है. इस चौंकाने वाले फैसले का बचाव करते हुए अमेरिकी अफसरों ने अब अंदर की बात बताई है. उनका कहना है कि वैश्विक बाजार में तेल की किल्लत को रोकने और भारत जैसे बड़े सहयोगी पर से दबाव कम करने के लिए यह कॉमन सेंस वाला फैसला जरूरी था.
रविवार को कई अमेरिकी टीवी टॉक शो में नजर आए ट्रंप प्रशासन के आला अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह कदम न केवल भारत के हित में है, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को महंगाई के झटके से बचाने के लिए भी उठाया गया है.
‘लाखों बैरल तेल समंदर में फंसा था’
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत माइक वाल्ट्ज ने एनबीसी के ‘मीट द प्रेस’ कार्यक्रम में इस छूट के पीछे का असली तर्क साझा किया. उन्होंने कहा, यह केवल 30 दिनों का एक ‘पॉज’ है. यह पूरी तरह से कॉमन सेंस की बात है कि समंदर में जहाजों पर जो लाखों-लाख बैरल तेल पड़ा हुआ है, उसे भारतीय रिफाइनरियों तक पहुंचने दिया जाए. अगर हम ऐसा नहीं करते, तो ग्लोबल मार्केट पर दबाव असहनीय हो जाता.
वाल्ट्ज के इस बयान से साफ है कि अमेरिका को इस बात का अहसास था कि अगर भारत को रूसी तेल खरीदने से रोका गया, तो दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई चेन टूट जाएगी, जिसका सबसे बुरा असर खुद अमेरिका पर पड़ सकता है.
डर और कीमतों के उछाल को थामने की कोशिश
वहीं, अमेरिका के ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने सीएनएन के ‘स्टेट ऑफ द यूनियन’ में कहा कि इस छूट का मकसद तेल की कमी के डर को खत्म करना है. उन्होंने कहा, “बाजार में इस समय तेल की कमी नहीं है, बल्कि ‘कमी का डर’ है. इस छूट से हमें कीमतों में आए अचानक उछाल और बाजार की चिंताओं को शांत करने में मदद मिलेगी.”
ईरान के साथ युद्ध दूसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है और फिलहाल इसके खत्म होने के आसार नजर नहीं आ रहे. ऐसे में अमेरिका के भीतर भी पेट्रोल-डीजल की कीमतें रॉकेट की रफ्तार से बढ़ रही हैं. शुक्रवार तक अमेरिका में रेगुलर पेट्रोल की औसत कीमत 3.32 डॉलर प्रति गैलन पहुंच गई, जो पिछले हफ्ते के मुकाबले 11% ज्यादा है. यह सितंबर 2024 के बाद का उच्चतम स्तर है. डीजल की कीमतें भी 15% उछलकर 4.33 डॉलर पर पहुंच गई हैं.
‘ट्रेडर बढ़ा रहे दाम’
इस संकट के बीच लुइसियाना के रिपब्लिकन सीनेटर जॉन कैनेडी ने तेल के सट्टेबाजों पर तीखा हमला बोला. उन्होंने ‘फॉक्स न्यूज संडे’ पर तंज कसते हुए कहा, “तेल की कीमतें इसलिए बढ़ी हैं क्योंकि बाहर ‘गुच्ची लोफर्स’ पहने और हाथों में ‘कैरामेल फ्रैपुचिनो’ लिए तेल व्यापारियों की फौज बैठी है, जो सिर्फ बोली लगाकर कीमतें ऊपर ले जा रहे हैं.” उनका इशारा था कि असल में तेल की कमी नहीं है, बल्कि बाजार में बैठे लोग इस जंग का फायदा उठाकर मुनाफाखोरी कर रहे हैं.
ट्रंप की भविष्यवाणी- ‘बस कुछ हफ्तों की बात है’
भले ही जानकारों को यह जंग लंबी खिंचती दिख रही हो, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके अधिकारी इसे बहुत छोटा मान रहे हैं. ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने भरोसा जताया कि यह जंग हफ्तों चलेगी, महीनों नहीं. उन्होंने कहा, कीमतों में यह बढ़ोतरी केवल ‘डर और धारणा’ पर टिकी है. जैसे ही ईरान ऑपरेशन खत्म होगा, कीमतें तेजी से नीचे आएंगी. खुद राष्ट्रपति ट्रंप ने भी एक इंटरव्यू में दावा किया था कि युद्ध समाप्त होते ही गैस की कीमतें बहुत तेजी से गिरेंगी. ट्रंप प्रशासन के लिए तेल की कीमतें कम करना केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक मजबूरी भी है. नवंबर में होने वाले मिड-टर्म चुनाव सिर पर हैं और अगर पेट्रोल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो इसका खामियाजा रिपब्लिकन पार्टी को भुगतना पड़ सकता है.
भारत के लिए क्या हैं इसके मायने?
भारत के लिए अमेरिका का यह फैसला किसी बड़ी संजीवनी से कम नहीं है. रूस से सस्ता तेल मिलना जारी रहने का मतलब है कि भारतीय रिफाइनरियों को कच्चा माल मिलता रहेगा और घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी. अमेरिका का यह ‘यू-टर्न’ दिखाता है कि वैश्विक राजनीति में भारत का कद इतना बढ़ चुका है कि वाशिंगटन को अपनी पाबंदियों की नीतियों में भी ‘फ्लेक्सिबिलिटी’ लानी पड़ रही है.
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