महिलाओं पर बीमारियों का बोझ ज्यादा, फिर भी पुरुषों से ज्यादा लंबी जिंदगी ! आखिर क्या है वजह?

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International Women’s Day 2026: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हर तरफ वीमेन्स से जुड़ी चर्चाएं हो रही हैं. कहीं महिलाओं की उपलब्धियां गिनाई जा रही हैं, तो कहीं उनके अधिकारों को लेकर बात की जा रही है. इस बीच महिलाओं से जुड़ी सबसे बड़ी परेशानी यानी हेल्थ इश्यूज का जिक्र बहुत कम हो रहा है. घर-परिवार और प्रोफेशनल लाइफ की जिम्मेदारियों का बोझ महिलाओं की सेहत के लिए खतरनाक साबित हो रहा है. आजकल कम उम्र की महिलाएं भी गंभीर बीमारियों का शिकार हो रही हैं. आपको जानकर हैरानी होगी कि महिलाएं आमतौर पर पुरुषों से ज्यादा लंबी उम्र तक जीवित रहती हैं, लेकिन उनके जिंदगी कई कई साल बीमारी से जूझते हुए गुजरते हैं. इससे उनकी जिंदगी ज्यादा दर्दनाक और कष्टकारी हो जाती है.

BMJ की रिपोर्ट के मुताबिक ग्लोबल स्टडी में पता चला है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में लंबी जिंदगी जीती हैं, लेकिन वे पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा बीमारियां भी झेलती हैं. साल 2024 में इसे लेकर एक स्टडी सामने आई थी, जिसमें करीब 30 सालों के हेल्थ डाटा का विश्लेषण किया गया था. इसमें पता चला कि महिलाओं और पुरुषों में यह अंतर टीनएज से ही शुरू हो जाता है और उम्र बढ़ने के साथ-साथ बढ़ता जाता है. आसान भाषा में कहें, तो पुरुषों की मौत अक्सर जल्दी हो जाती है, जबकि महिलाएं लंबे समय तक जीवित तो रहती हैं, लेकिन उनका बुढ़ापा बीमारियों के बीच कटता है.
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शोधकर्ताओं की मानें तो पुरुषों में ऐसी बीमारियां ज्यादा होती हैं, जो जानलेवा होती हैं. इनमें हार्ट हार्ट अटैक या गंभीर इन्फेक्शन शामिल होते हैं. इसी वजह से पुरुषों की औसत आयु कम होती है. दूसरी ओर महिलाओं में ऐसी बीमारियां ज्यादा देखी गई हैं, जो जान तो नहीं लेतीं, लेकिन शरीर को अंदर से कमजोर कर देती हैं. महिलाएं अपनी लंबी उम्र का एक बड़ा हिस्सा दर्द, थकान और दवाइयों के सहारे गुजारती हैं. महिलाओं में हड्डियों का दर्द यानी आर्थराइटिस, माइग्रेन, पीठ दर्द, एंजायटी और डिप्रेशन जैसी समस्याएं बहुत ज्यादा होती हैं. ये बीमारियां महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी को मुश्किल बना देती हैं. वहीं पुरुषों में शराब से जुड़ी बीमारियां, फेफड़ों की समस्या और सड़क दुर्घटनाओं के मामले ज्यादा होते हैं, जो असमय मृत्यु का कारण बनते हैं.

यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन की शोधकर्ता लुइसा सोरियो फ्लोर बताती हैं कि यह अंतर 10-12 साल की उम्र से ही दिखने लगता है. लड़कियों में हार्मोनल बदलाव और सामाजिक दबाव के कारण मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक दर्द की शिकायतें लड़कों से पहले शुरू हो जाती हैं. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, ये छोटी-छोटी तकलीफें जमा होती जाती हैं, जिससे बुढ़ापे तक पहुंचते-पहुंचते महिलाओं का शरीर पुरुषों के मुकाबले ज्यादा कमजोर हो जाता है. महिलाओं को लंबी उम्र का जैविक वरदान मिला है. उनके शरीर में मौजूद एस्ट्रोजन हार्मोन मेनोपॉज तक उनके दिल की रक्षा करता है. हालांकि सामाजिक तौर पर महिलाएं अक्सर अपनी सेहत को नजरअंदाज करती हैं. घर-परिवार की देखभाल के चक्कर में वे अपनी छोटी बीमारियों का इलाज नहीं करातीं. यही वजह है कि उनकी छोटी तकलीफें समय के साथ क्रोनिक डिजीज में बदल जाती हैं, जो ताउम्र उनका पीछा नहीं छोड़ती हैं.

वैज्ञानिकों का कहना है कि अब समय आ गया है कि सरकारें और डॉक्टर महिलाओं और पुरुषों के स्वास्थ्य को एक ही तरह से देखना बंद करें. महिलाओं के लिए ऐसी स्वास्थ्य योजनाएं बनानी चाहिए, जो उनकी पुरानी बीमारियों पर ध्यान दें. वहीं, पुरुषों के लिए ऐसी रणनीतियां चाहिए, जो उन्हें रिस्क लेने वाली आदतों और दिल की बीमारियों से बचा सकें. बिना जेंडर-स्पेसिफिक इलाज के यह खाई नहीं भरी जा सकती है. यह स्टडी बताती है कि सिर्फ सांसें चलना काफी नहीं है, बल्कि सेहतमंद रहना सबसे जरूरी है. महिलाओं को कुदरत ने लंबी उम्र तो दी है, लेकिन उस उम्र को खुशहाल बनाने के लिए उन्हें अपनी सेहत को प्राथमिकता देनी होगी.

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