[ad_1]
संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण आज से शुरू हो रहा है. इसकी शुरुआत लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष की तरफ से लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर बहस से होने की संभावना है. विपक्ष ने बजट सत्र के पहले चरण के दौरान लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया था, जिस पर 118 सांसदों के हस्ताक्षर बताए गए हैं. उस समय ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने इस नोटिस पर साइन नहीं किए थे, लेकिन अब पार्टी ने साफ कर दिया है कि वह इस मुद्दे पर विपक्ष का समर्थन करेगी.
नोटिस में आरोप लगाया गया है कि स्पीकर का रवैया पक्षपातपूर्ण रहा है. विपक्ष का कहना है कि लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी और अन्य नेताओं को बोलने का पर्याप्त मौका नहीं दिया गया. साथ ही आठ विपक्षी सांसदों को पूरे बजट सत्र के लिए निलंबित किए जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं. नोटिस में यह भी आरोप लगाया गया कि कुछ महिला सांसदों के खिलाफ निराधार आरोप लगाए गए.
प्रस्ताव पर कैसे होती है कार्रवाई
- संसदीय नियमों के अनुसार अविश्वास प्रस्ताव के लिए कम से कम दो सांसदों के हस्ताक्षर और 14 दिन का नोटिस आवश्यक होता है. इसके साथ ही सदन में कम से कम 50 सांसदों का समर्थन जरूरी है.
- अगर नोटिस स्वीकार कर लिया जाता है तो लोकसभा में इस पर चर्चा के लिए समय तय किया जाता है और फिर सदन में बहस होती है.
- नियमों के मुताबिक, इस बहस के दौरान स्पीकर अपनी कुर्सी पर नहीं बैठते. आम तौर पर कार्यवाही का संचालन उपाध्यक्ष करते हैं, लेकिन फिलहाल उपाध्यक्ष का पद खाली है. ऐसे में स्पीकर के पैनल में शामिल सबसे वरिष्ठ सांसद कार्यवाही की अध्यक्षता कर सकते हैं. इसके लिए जगदंबिका पाल का नाम चर्चा में है.
पहले भी आ चुके हैं ऐसे प्रस्ताव
लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का यह पहला मामला नहीं है.
- 1954 में तत्कालीन स्पीकर जीवी मावलंकर के खिलाफ पहला अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था. उस समय विपक्ष का नेतृत्व जेबी कृपलानी कर रहे थे और प्रस्ताव विज्ञनेश्वर मिश्रा ने रखा था. हालांकि यह प्रस्ताव मतदान में गिर गया था.
- 1966 में मधु लिमये ने तत्कालीन स्पीकर हुकुम सिंह के खिलाफ प्रस्ताव रखा था, लेकिन पर्याप्त समर्थन न मिलने के कारण इसे खारिज कर दिया गया.
- 1987 में सीपीएम नेता सोमनाथ चटर्जी ने उस समय के स्पीकर बलराम जाखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था, जो अंततः पारित नहीं हो सका.
- हाल के वर्षों में दिसंबर 2024 में विपक्ष ने राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के खिलाफ भी अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया था, लेकिन इसे राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने खारिज कर दिया था.
संख्या बल में कमजोर विपक्ष
लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के लिए सदन में साधारण बहुमत यानी 272 वोटों की जरूरत होती है. मौजूदा स्थिति में यह संख्या विपक्ष के लिए हासिल करना मुश्किल माना जा रहा है.
वर्तमान लोकसभा में सत्तारूढ़ गठबंधन राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन के पास करीब 293 सांसदों का समर्थन है. इनमें बीजेपी के 240, जेडीयू के 16, तेलुगु देशम पार्टी के 12 और अन्य सहयोगी दलों के सांसद शामिल हैं.
वहीं विपक्षी दलों के पास कुल मिलाकर करीब 238 सांसद हैं, जिनमें कांग्रेस के 99 सांसद हैं. इसके अलावा समाजवादी पार्टी, डीएमके, तृणमूल कांग्रेस और अन्य दल शामिल हैं.
ऐसे में अगर अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान होता है तो विपक्ष के लिए इसे पारित कराना कठिन माना जा रहा है. हालांकि बहस के दौरान संसद में तीखी नोकझोंक और राजनीतिक टकराव देखने को मिल सकता है.
[ad_2]
Source link
