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ईरान के स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद कर देने से पूरी दुनिया में तेल सप्लाई का सबसे बड़ा रास्ता बंद हो गया है. इससे इकॉनमी को जो खतरा होना है, वो तो अलग बात, लेकिन सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि तेल और गैस की सप्लाई पर कितना असर होगा? लेकिन क्या भारत को भी इससे बहुत ज्यादा चिंतित होना चाहिए? सूत्रों ने News18 को बताया है कि फिलहाल भारत के लिए कोई बड़ी चिंता की बात नहीं है.
ईरान युद्ध तेज होने के साथ ही सोमवार को तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गईं, जिससे प्रोडक्शन और शिपिंग को खतरा पैदा हो गया और शेयर मार्केट में गिरावट आई. हालांकि बाद में कीमतें नीचे गिरीं. अंतरराष्ट्रीय मानक माने जाने वाले ब्रेंट क्रूड की कीमत दिन की शुरुआत में 119.50 डॉलर प्रति बैरल तक उछल गई थी, लेकिन बाद में यह 107.80 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रही थी.
तेल की कीमतों में यह उछाल इसलिए आया है क्योंकि यह युद्ध उन देशों और जगहों को अपनी चपेट में ले रहा है जो फारस की खाड़ी से तेल और गैस के उत्पादन और आवाजाही के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं.
कीमतों में क्यों आई नरमी
‘फाइनेंशियल टाइम्स’ की उस रिपोर्ट के बाद कीमतों में थोड़ी नरमी आई जिसमें कहा गया था कि G7 देशों के कुछ सदस्य बाजारों पर दबाव कम करने के लिए अपने रणनीतिक तेल भंडार से तेल जारी करने पर विचार कर रहे हैं. इस अपुष्ट रिपोर्ट में बातचीत से जुड़े अज्ञात लोगों का हवाला दिया गया. शनिवार को, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व का उपयोग करने के विचार को कम महत्व देते हुए कहा कि अमेरिकी आपूर्ति पर्याप्त है और कीमतें जल्द ही गिर जाएंगी.
कितना तेल आता है इस रास्ते
- स्वतंत्र रिसर्च फर्म ‘रिस्टैड एनर्जी’ के अनुसार, लगभग 1.5 करोड़ बैरल कच्चा तेल आमतौर पर हर दिन होर्मुज के रास्ते जाता है. यह तेल की कुल सप्लाई का 20 फीसदी है. ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों के खतरे ने इस रास्ते से टैंकरों की आवाजाही को लगभग रोक दिया है. यह रास्ता उत्तर में ईरान से घिरा है और सऊदी अरब, कुवैत, इराक, कतर, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ईरान से तेल और गैस लेकर निकलता है.
- इराक, कुवैत और यूएई ने अपने तेल उत्पादन में कटौती की है क्योंकि कच्चे तेल के निर्यात की क्षमता कम होने के कारण उनके स्टोरेज टैंक भर गए हैं. युद्ध शुरू होने के बाद से ईरान, इजरायल और संयुक्त राज्य अमेरिका ने भी तेल और गैस सुविधाओं पर हमले किए हैं, जिससे आपूर्ति की चिंताएं और बढ़ गई हैं.
- तेल और प्राकृतिक गैस की लागत में वृद्धि से ईंधन की कीमतें ऊपर जा रही हैं, जिसका असर दूसरे उद्योगों पर भी पड़ रहा है. इससे एशियाई अर्थव्यवस्थाएं हिल गई हैं, जो इस क्षेत्र से होने वाले आयात पर भारी निर्भरता के कारण विशेष रूप से कमजोर हैं.
- पिछली बार ब्रेंट और अमेरिकी क्रूड वायदा मौजूदा स्तर के करीब 2022 में थे, जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया था. ऊर्जा की ऊंची लागत मुद्रास्फीति (महंगाई) को बढ़ाती है, जिससे घरेलू बजट बिगड़ जाता है और उपभोक्ता खर्च में कमी आती है, जो कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का मुख्य इंजन है.
भारत पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने का असर
- भारत अपनी जरूरत का लगभग 88% कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें से लगभग 50% से 60% आयात इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत जैसे सप्लायर्स से होर्मुज के रास्ते आता है.
- भारत की लगभग 50% से 60% एलएनजी और 80% से 85% एलपीजी यानी रसोई गैस इसी रास्ते से होकर आती है. तेल के विपरीत, गैस के मामले में भारत के पास बहुत कम अतिरिक्त स्टॉक है, जिससे यह सप्लाई और भी संवेदनशील हो जाती है.
- कच्चे तेल की कीमतों में हर 1 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का वार्षिक आयात बिल लगभग 2 अरब डॉलर बढ़ सकता है. विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि तेल की कीमतों में 10 डॉलर की बढ़ोतरी भारत की जीडीपी (GDP) को 0.5% तक कम कर सकती है.
क्या भारत को चिंता करनी चाहिए?
कच्चा तेल : भारत का वर्तमान कच्चा तेल भंडार 10 करोड़ बैरल अनुमानित है, जिसके बारे में सूत्रों का कहना है कि यह कम से कम 25 दिनों तक चल सकता है. सूत्रों ने कहा कि G7 द्वारा तेल छोड़ने के आश्वासन के साथ, कीमतों में कमी आने की संभावना है.
रूस का रास्ता : भारत फिर से रूसी कच्चे तेल की ओर रुख कर सकता है, क्योंकि वर्तमान में हिंद महासागर में लाखों बैरल तेल टैंकरों में तैर रहा है, जो एक तैयार विकल्प है. रिपोर्टों के अनुसार, भारत अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से भी आपूर्ति बढ़ाने पर विचार कर रहा है.
भारत को राहत: कुछ रिपोर्टों से पता चलता है कि ईरान उन देशों के लिए ट्रैफिक की अनुमति दे सकता है जो अमेरिका या इजरायल के साथ नहीं हैं, जो भारतीय टैंकरों के लिए एक महत्वपूर्ण रास्ता साबित हो सकता है.
एनर्जी प्रोडक्ट: सूत्रों ने कहा कि नई दिल्ली के ऊर्जा उत्पाद भी 25 दिनों तक चल सकते हैं. सूत्रों ने कहा, एविएशन फ्यूल पर कोई चिंता नहीं है क्योंकि हम निर्यातक हैं और हमारे पास पर्याप्त स्टॉक है. पेट्रोल की कीमतों में भी वृद्धि की संभावना नहीं है.
एलपीजी और गैस: रसोई गैस की स्थिति के मामले में, जिसका बड़ा हिस्सा होर्मुज से आता है, अभी स्पष्टता का इंतजार है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि स्थिति नियंत्रण में है. एलएनजी के कमर्शियल बनाम घरेलू उपयोग के मामले में, घरेलू उपभोक्ता की खपत को प्राथमिकता दी जाएगी.
खाद का संकट: फारस की खाड़ी यूरिया और अमोनिया का एक बड़ा स्रोत है और लंबे समय तक रास्ता बंद रहने से खाद का संकट पैदा हो सकता है. रिपोर्टों के अनुसार, चाय जैसे प्रमुख भारतीय निर्यात और हीरे को लॉजिस्टिक्स और बीमा के कारण बढ़ती लागत का सामना करना पड़ सकता है. कई महत्वपूर्ण अंडरसी केबल जैसे SMW4 और FALCON इसी क्षेत्र से गुजरती हैं; जारी सुरक्षा जोखिमों ने आवश्यक मरम्मत को रोक दिया है, जिससे भारत के डिजिटल ईकोसिस्टम को खतरा पैदा हो गया है.
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