General Knowledge: भारत मे पहली झील किस राजा ने बनवाई थी, क्या अब भी बचा है इसका वजूद? जानिए सबकुछ

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भारत में नदियों को मां की तरह पूजा जाता है. गंगा, यमुना से लेकर नर्मदा और गोदावरी तक, ऐसी तमाम विशाल नदियों के पानी का इस्तेमाल खेती-किसानी में होता है. इतना ही नहीं, कई जगहों पर तो विशाल डैम, जलाशय बनाकर पानी इकट्ठा किया जाता है, ताकि उनका उपयोग साफ-सफाई के बाद पीने के लिए किया जा सके. नैनीताल से लेकर भोपाल तक, तमाम शहरों में बड़ी-बड़ी झीलें देखने को मिल जाएंगी. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या आप भारत की उस पहली झील का नाम जानते हैं, जिसका निर्माण 2300 साल पहले हुआ था? किस राजा ने भारत की उस पहली झील बनवाया था? वो झील कहां पर बनी थी? क्या आज भी उस झील का वजूद बचा है या फिर गायब हो गया? अगर नहीं जानते, तो आज हम आपको India First सीरीज के तहत उस पहली झील का नाम बताने जा रहे हैं. वो झील सुदर्शन लेक है, जो गुजरात के जूनागढ़ में हुआ करता था. इसके निर्माण का इतिहास भी बेहद रोचक है.

ऐतिहासिक शिलालेखों के अनुसार, भारत की पहली मानव निर्मित झील का निर्माण मौर्य वंश के संस्थापक सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के आदेश पर कराया गया था. उस समय सौराष्ट्र क्षेत्र के प्रांतीय गवर्नर पुष्यगुप्त वैश्य को यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी. यह झील आज के गुजरात राज्य के जूनागढ़ जिले में गिरनार की पहाड़ियों के पास बनाई गई थी. करीब 322 ईसा पूर्व में जब चंद्रगुप्त मौर्य ने मौर्य साम्राज्य की स्थापना की, तब उनका लक्ष्य केवल राज्य का विस्तार करना ही नहीं था, बल्कि जनता के जीवन को बेहतर बनाना भी था. सौराष्ट्र का इलाका उस समय काफी शुष्क यानी सूखा माना जाता था और यहां पानी की कमी से आम जनजीवन त्रस्त था. खेती-किसानी करने में भी समस्या होती थी. इसी को ध्यान में रखते हुए सुवर्णसिक्ता और पलाशिनी नदियों के पानी को रोककर एक बड़ा जलाशय बनाने का फैसला किया गया. यही जलाशय आगे चलकर सुदर्शन झील के नाम से प्रसिद्ध हुआ. दिलचस्प बात यह है कि उस दौर में इतनी बड़ी झील का निर्माण करना अपने आप में एक अद्भुत इंजीनियरिंग उपलब्धि माना जाता है.

कई राजाओं ने करवाई मरम्मत और विस्तार
सुदर्शन झील का महत्व केवल उसके निर्माण तक ही सीमित नहीं था. आने वाले कई शासकों ने भी समय-समय पर इसकी मरम्मत और विस्तार करवाया. चंद्रगुप्त मौर्य के बाद उनके पोते सम्राट अशोक के समय इस झील को और विकसित किया गया. कहा जाता है कि उस दौर में यवन शासक तुषास्प ने झील से नहरें निकलवाकर खेतों तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था करवाई थी. हालांकि, समय-समय पर भारी बारिश और प्राकृतिक आपदाओं के कारण झील का बांध कई बार टूट गया. 150 ईस्वी के आसपास शक शासक रुद्रदामन प्रथम के समय भीषण बारिश से झील को भारी नुकसान पहुंचा था. जूनागढ़ के प्रसिद्ध शिलालेख में इसका उल्लेख मिलता है. कहा जाता है कि रुद्रदामन ने बिना कोई नया कर लगाए अपने निजी खजाने से इस झील की मरम्मत करवाई और इसे पहले से अधिक मजबूत बनवाया. इसके बाद गुप्त काल में भी यह झील एक बार फिर क्षतिग्रस्त हुई. सम्राट स्कंदगुप्त के शासनकाल (लगभग 455-467 ईस्वी) में झील के बांध को फिर से बनाया गया. उस समय प्रांतीय अधिकारी पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित को यह काम सौंपा गया था.

क्या आज भी मौजूद है सुदर्शन झील?
अब सवाल यह उठता है कि क्या आज भी इस ऐतिहासिक झील का वजूद बचा है? ऐसे में बता दें कि वर्तमान में जूनागढ़ के गिरनार क्षेत्र में जाने पर आपको वह विशाल जलाशय अपने मूल रूप में नहीं दिखेगा, जैसा वह मौर्य या गुप्त काल में था. समय के साथ प्राकृतिक बदलाव, नदियों के रास्ते बदलने और देखभाल की कमी के कारण यह विशाल जलाशय धीरे-धीरे खत्म हो गया. हालांकि, जूनागढ़ के गिरनार क्षेत्र में आज भी कुछ छोटे जलाशय और बांध दिखाई देते हैं, जिन्हें उसी प्राचीन जल प्रणाली से जोड़ा जाता है. यहां मौजूद शिलालेख इस बात की गवाही देते हैं कि कभी इस इलाके में एक विशाल झील हुआ करती थी, जो पूरे सौराष्ट्र क्षेत्र की प्यास बुझाती थी. इतिहासकारों के मुताबिक, यह झील सिर्फ पानी का स्रोत नहीं थी, बल्कि उस समय के लोगों के जीवन का आधार मानी जाती थी.

इतिहास में जीवित है सुदर्शन झील की विरासत
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने जूनागढ़ के उन शिलालेखों को संरक्षित किया है, जिनमें सुदर्शन झील के निर्माण और मरम्मत का पूरा विवरण दर्ज है. गिरनार के पास स्थित दामोदर कुंड और आसपास का इलाका भी उसी ऐतिहासिक जल प्रणाली का हिस्सा माना जाता है. देश के इस पहले झील का निर्माण साबित करता है कि प्राचीन भारत में सस्टेनेबल इंजीनियरिंग और जल प्रबंधन कितना उन्नत था. सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य से लेकर स्कंदगुप्त तक, हर राजा ने इसे अपनी विरासत का हिस्सा माना. भले ही आज वह विशाल सुदर्शन झील आंखों के सामने न हो, लेकिन इसका नाम हमेशा भारत की पहली इंजीनियरिंग मिसाल के रूप में लिया जाता रहेगा. यह झील प्रतीक है उस काल का जब राजा अपनी प्रजा की खुशहाली के लिए नदियों की धारा मोड़ने का साहस रखते थे. अगर आप आज जूनागढ़ जाते हैं, तो गिरनार की तलहटी में उन शिलालेखों को जरूर देख सकते हैं, जो भारत के इस गौरवशाली जल इतिहास को आज भी जिंदा रखे हुए हैं.

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