[ad_1]
गोंडा: उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में एक ऐसा स्थान है, जिसे लोग बहुत ही पवित्र और प्राचीन मानते हैं. विकासखंड बेलसर के ग्राम सभा अमदही में स्थित महर्षि अष्टावक्र आश्रम श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह स्थान त्रेतायुग से जुड़ा हुआ है और यहां महान ऋषि महर्षि अष्टावक्र ने कठोर तपस्या की थी.
लोकल 18 से बातचीत के दौरान ग्रामीण के अरुण कुमार सिंह बताते हैं कि यह आश्रम हजारों वर्ष पुराना है. यहां का वातावरण आज भी शांत और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा हुआ महसूस होता है. दूर-दूर से लोग यहां दर्शन करने और मन की शांति पाने के लिए आते हैं. खासकर धार्मिक अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है.
इसलिए पड़ा “अष्टावक्र” नाम
अरुण कुमार सिंह बताते हैं कि महर्षि अष्टावक्र प्राचीन काल के महान विद्वान और संत थे. उनका नाम “अष्टावक्र” इसलिए पड़ा, क्योंकि उनके शरीर में आठ स्थानों पर वक्रता यानी टेढ़ापन था. कहा जाता है कि यह स्थिति उन्हें जन्म से ही थी. लेकिन शारीरिक कमजोरी के बावजूद उनका ज्ञान असाधारण था. बचपन में ही उन्होंने वेद और शास्त्रों का गहरा ज्ञान प्राप्त कर लिया था.
एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, उन्होंने अपनी बुद्धि और तर्क शक्ति से बड़े-बड़े विद्वानों को परास्त किया था. उनका जीवन यह संदेश देता है कि इंसान की असली ताकत उसका ज्ञान और आत्मविश्वास होता है, न कि उसका शरीर. यही कारण है कि आज भी लोग उन्हें प्रेरणा के रूप में याद करते हैं.
प्राकृतिक सुंदरता से घिरा अमदही गांव
अरुण सिंह बताते हैं कि अमदही गांव में स्थित यह आश्रम प्राकृतिक सुंदरता से भी घिरा हुआ है. यहां पेड़-पौधों और हरियाली के बीच बना यह स्थान ध्यान और साधना के लिए उपयुक्त माना जाता है. स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, जो भी सच्चे मन से यहां प्रार्थना करता है, उसकी मनोकामना पूरी होती है.
समय के साथ इस आश्रम में कुछ निर्माण कार्य भी कराए गए हैं, ताकि श्रद्धालुओं को सुविधा मिल सके. यहां समय-समय पर धार्मिक कार्यक्रम और भजन-कीर्तन भी आयोजित किए जाते हैं. आसपास के गांवों के लोग इस स्थान को अपनी आस्था का केंद्र मानते हैं और इसकी देखभाल में सहयोग करते हैं. यहीं से होकर 84 कोसी परिक्रमा के लिए साधु संत जाते हैं और यहीं पर रुकने की व्यवस्था भी की जाती है.
क्यों है महत्वपूर्ण?
अरुण कुमार सिंह बताते हैं कि महर्षि अष्टावक्र आश्रम न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हमारी प्राचीन संस्कृति और परंपरा की भी याद दिलाता है. यह स्थान हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी ज्ञान और भक्ति के मार्ग पर चलकर महानता प्राप्त की जा सकती है.
क्यों कहा जाता है इस स्थान को रामघाट?
अरुण कुमार सिंह बताते हैं कि एक बार अयोध्या से निमंत्रण आया था, लेकिन महर्षि अष्टावक्र ने जाने से मना कर दिया था. तब इस बात का पता भगवान राम को चला, तो राम जी ने स्वयं आकर महर्षि अष्टावक्र से पूछा कि महाराज आप क्यों नहीं आएंगे. उन्होंने बताया कि हमको जल लेने के लिए सरयू नदी जाना पड़ता है, जो हमारे यहां से लगभग 4 से 5 किलोमीटर दूरी पर स्थित है. हम नहीं आ पाएंगे, क्योंकि हम शरीर से भी असमर्थ हैं. फिर प्रभु राम ने अपने बल से यहीं पर सरयू नदी को निकाला और तब से इस स्थान को रामघाट के नाम से भी जाना जाता है.
Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी, राशि-धर्म और शास्त्रों के आधार पर ज्योतिषाचार्य और आचार्यों से बात करके लिखी गई है. किसी भी घटना-दुर्घटना या लाभ-हानि महज संयोग है. ज्योतिषाचार्यों की जानकारी सर्वहित में है. बताई गई किसी भी बात का Local-18 व्यक्तिगत समर्थन नहीं करता है.
[ad_2]
Source link
